प्रतिकूल मौसम और अलगाववादियों के बहिष्कार के आह्वान की अनदेखी करते हुए जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव के पहले चरण में लोगों ने जिस उत्साह के साथ वोट दिया, उससे लोकतंत्र के प्रति उनके भरोसे का ही पता चलता है। हाड़ कंपाती ठंड के कारण कारगिल में मतदान का प्रतिशत जरूर कम रहा, पर जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में सुबह से ही मतदान के लिए लगी लंबी कतारें बता रही थीं कि लोकतंत्र के इस उत्सव में वहां के मतदाता किसी से पीछे नहीं रहना चाहते।
सूबे में मतदान के प्रति इस उत्साह की एक वजह तो नए मतदाताओं का जुनून ही है। जागरूकता बढ़ने, तस्वीर बदलने की आकांक्षा पैदा होने और चुनाव आयोग की पहल ने देश के दूसरे इलाकों की तरह जम्मू-कश्मीर में भी युवा मतदाताओं को भारी संख्या में मतदान करने के लिए प्रेरित किया, नतीजतन पहले चरण में मतदान 71 प्रतिशत से अधिक रहा। वोटिंग के प्रति यह उत्साह भारतीय लोकतंत्र की मजबूती के बारे में तो बताता ही है, खासकर उस राज्य में यह प्रवृत्ति और भी सराहनीय है, जिसे मुट्ठी भर अलगाववादी और पाक प्रायोजित आतंकवादी संगठन अपने नापाक मंसूबों का केंद्र बनाने की जब-तब कोशिश करते हैं।
हालांकि बढ़े मतदान प्रतिशत की वजह सिर्फ युवा मतदाताओं का उत्साह ही नहीं है। राज्य की राजनीतिक स्थिति ने भी लोगों को बड़ी संख्या में घरों से बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया। मसलन, जम्मू और लद्दाख में भाजपा की सक्रियता से मतदाताओं में उत्साह है, और वे राज्य में सुखद बदलाव के आकांक्षी हैं। दूसरी ओर, घाटी में मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग बाढ़ के बाद से सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस से नाराज है, ऐसे में बढ़े हुए मतदान प्रतिशत को सत्ता-विरोधी रुझान का संकेत माना जा सकता है।
पिछले कुछ समय से सूबे की मौजूदा पहचान को बदलने की जो बात की जा रही है, उस आशंका को निर्मूल करने के लिए भी घाटी के लोगों ने भारी संख्या में मतदान किया हो, तो आश्चर्य नहीं। अलगाववादियों के बहिष्कार आह्वानों की विफलता को भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए। बताया यह भी जा रहा है कि राजनीतिक घमासान तेज होने के कारण पहली बार घाटी में राजनीतिक प्रचार ज्यादा खुला और लोकतांत्रिक हो पाया है। अपेक्षा यही है कि मतदाताओं का ऐसा ही उत्साह राज्य में मतदान के आगामी चरणों में भी देखने को मिलेगा।