रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति का संदेश यह है कि आर्थिक मोर्चे पर अच्छे दिनों के लिए अभी इंतजार करना होगा। रिपोर्ट में बहुत साफ-साफ कहा गया है कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कम से कम दो साल लगेंगे। यही संभावना विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे वैश्विक वित्तीय संगठन भी जता चुके हैं।
बजट से जो उम्मीद बन गई थी, उसी से यह भरोसा बनने लगा था कि अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए ब्याज दरों में कटौती कभी भी हो सकती है। पिछले दो महीने से खुदरा मुद्रास्फीति में आई कमी ने भी इस संभावना को बल दे दिया था। इसीलिए खासकर उद्योग-जगत कर्ज सस्ता होने की उम्मीद लगाए बैठा था।
इसके बावजूद रिजर्व बैंक ने इस मामले में रक्षात्मक रवैया अपनाया, तो इसे समझा जा सकता है। यह याद रखने की जरूरत है कि मानसून की शुरुआत में बारिश कम होने से खरीफ की बुआई कम हुई है, जिसका असर खाद्यान्न उत्पादन पर पड़ेगा। खाने-पीने की चीजों के दाम अक्सर मौसम के उतार-चढ़ाव और अचानक उपलब्धता घटने से भी बढ़ जाते हैं। ऐसे में, उत्पादन में कमी आने की आशंका से खाद्य पदार्थों की महंगाई बढ़ने के खतरे की अनदेखी नहीं की जा सकती। इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में कटौती का फिलहाल साहस नहीं किया।
लेकिन महंगाई घटने पर ब्याज दर कम करने का जो भरोसा उसने दिलाया है, उसकी बहुत उम्मीद आने वाले दिनों में भी शायद ही है। ऐसे में एसएलआर (वैधानिक तरलता अनुपात) में कमी ही एकमात्र पहल है, जिससे थोड़ा खुश हुआ जा सकता है। इसमें कटौती कर रघुराम राजन ने लीक से अलग हटकर चलने का संदेश तो दिया ही; हालांकि इसे भारतीय बैंकों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप ले जाने की कवायद के तौर पर भी देखना चाहिए, निवेशकों को भी खुश कर दिया।
महंगाई के भय से केंद्रीय बैंक के सामने ब्याज दरों में कटौती न कर पाने की अगर विवशता है, तो आर्थिक मोर्चे पर कमोबेश सुधार का रुख देखते हुए अर्थव्यवस्था को गति देने की भी जरूरत है। बजट का संदेश भी यही है। रिजर्व बैंक के इस कदम से, जाहिर है, बाजार में नकदी की उपलब्धता बढ़ेगी। यानी कर्ज सस्ता भले न हो पाया हो, लेकिन उद्योग-धंधों को गति देने के लिए बैंकों के पास अधिक रकम होगा, जिससे वे ज्यादा से ज्यादा कर्ज दे पाएंगे। कठिन समय में यह राहत भी कम नहीं है।