अब संसद में असंसदीय दृश्य आम हैं, लेकिन बृहस्पतिवार को लोकसभा में तेलंगाना विधेयक रखे जाने के तत्काल बाद जो हुआ, वह संसदीय परंपरा के क्षरण के इन दुर्दिनों में भी अभूतपूर्व है। अचानक कांग्रेसी सांसद एल राजगोपाल ने जेब से काली मिर्च का पाउडर निकालकर स्प्रे कर दिया, जिससे संसद में अफरा-तफरी फैल गई, तो विजयवाड़ा से तेदेपा सांसद वेणुगोपाल रेड्डी ने कथित तौर पर चाकू निकाल लिया। उसके बाद जो हुआ, वैसा संसद में इससे पहले नहीं हुआ था। पिछले कुछ समय से तेलंगाना के मुद्दे पर संसद के भीतर जो दृश्य दिख रहे थे, यह वस्तुतः उन्हीं का चरम था।
यह घटनाक्रम सिर्फ संसद की गरिमा की अवहेलना का नहीं, केवल मामले को अपने हित में देखने की क्षुद्र राजनीति का ही नहीं, संसद को सुचारु रूप से चलाने में सरकार की चूक का और अपने सांसदों पर कांग्रेस हाईकमान की ढीली पकड़ का भी ज्वलंत उदाहरण है। स्वतंत्र तेलंगाना के खिलाफ वेणुगोपाल रेड्डी और एल राजगोपाल का गुस्सा अस्वाभाविक नहीं है। दोनों की तेलंगाना और हैदराबाद में बड़ी पूंजी लगी है; पी उपेंद्र के दामाद राजगोपाल तो आंध्र प्रदेश के सबसे धनी सांसद बताए जाते हैं। सीमांध्र के संभ्रांत लोगों का स्वतंत्र तेलंगाना के खिलाफ यह गुस्सा ही उनका इरादा बताने के लिए काफी है।
लेकिन कांग्रेस इस अफरातफरी में विधेयक ले आई, तो इसके पीछे लोकसभा चुनाव में उसका गुणा-भाग ही ज्यादा है; उसने उस आंध्र प्रदेश की जनभावनाओं को आंकने की परवाह नहीं की, जहां से यूपीए के दोनों कार्यकाल में उसके सर्वाधिक सांसद चुनकर आए हैं! इसी तरह जनसंघ के समय से स्वतंत्र तेलंगाना की पक्षधर भाजपा अभी इसके हक में नहीं है, क्योंकि विधेयक पारित हुआ, तो लाभ कांग्रेस को मिलेगा।
सवाल यह है कि इस घटना को शर्मनाक और लोकतंत्र का काला दिन बता रहा कांग्रेस नेतृत्व इस संवेदनशील मुद्दे पर शुरू से ही संजीदा क्यों नहीं रहा, और प्रधानमंत्री के साथ बैठकर संसद में सहयोग का वायदा करने वाली भाजपा अब इसका ठीकरा कांग्रेस पर क्यों फोड़ रही है। ऐसे में, कैसे मान लें कि संसद में इस शर्म के बाद तेलंगाना पर हमारे राजनीतिक दलों का नजरिया बदलेगा!