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निशाना कहीं और है

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जयपुर के जिस मंच से राहुल गांधी राजनीति की नई इबारत लिख रहे थे, उसी मंच से केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं संघ पर कथित हिंदू आतंकवाद को प्रश्रय देने के आरोप लगाए हैं। संभवतः यह पहला मौका है, जब यूपीए सरकार के किसी वरिष्ठ मंत्री ने सार्वजनिक मंच से प्रमुख विपक्षी दल पर आतंकी शिविर चलाने के गंभीर आरोप लगाए हैं। यह न केवल अनुचित है, बल्कि गैरजिम्मेदाराना भी।
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असल में गृह मंत्री शिंदे ने भाजपा और संघ पर हमले के लिए जो मंच और समय चुना, उसके राजनीतिक अर्थ बहुत साफ हैं। कांग्रेस ने यदि यह साफ कर दिया है कि वह 2014 का आम चुनाव राहुल के नेतृत्व में लड़ेगी, तो भाजपा में नरेंद्र मोदी के नाम पर सहमति बनती जा रही है।

भाजपा यदि मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं भी करती है, तब भी अगले आम चुनाव में वही पार्टी का चेहरा होंगे, इसमें किसी तरह का संदेह अब बचा नहीं है। दरअसल यह राहुल बनाम मोदी की लड़ाई है, जिसमें शायद कांग्रेस मोदी को हिंदुत्ववादी नेता के तौर पर दिखाना चाहती है। असल में गुजरात का चुनाव तीसरी बार जीतने के बावजूद मोदी की हिंदुत्ववादी छवि भाजपा की दुखती रग है।
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दूसरी ओर कांग्रेस के नेताओं के बयान जिस तरह से आ रहे हैं, उससे लगता है कि वे भी राजनीतिक विमर्श को एक खास दिशा देना चाहते हैं। आखिर शिंदे के बयान के बाद दिग्विजय सिंह का जमात उद दावा के प्रमुख और भारत में वांछित आतंकी मास्टरमाइंड हाफिज सईद के नाम का अदब से जिक्र करने का क्या मतलब है?

यदि यह वाकई वोट बैंक की राजनीति नहीं है, तो शिंदे के इस बयान की अभी जरूरत भी नहीं थी, खासतौर से इसलिए, क्योंकि उन्होंने जिन तीन मामलों (समझौता एक्सप्रेस पर हुए हमले, मक्का मस्जिद तथा मालेगांव में हुए विस्फोटों) का जिक्र किया है, तो उनमें कुछ भी नया नहीं है।

मुश्किल यह है कि कांग्रेस के नेता जितनी मुखरता से अभिनव भारत की आतंकी गतिविधियों की चर्चा करते हैं, उतनी मुखरता से सिमी या अन्य आतंकी संगठनों की नहीं। मामला भगवा या जेहादी आतंकवाद का नहीं है, आतंकवाद का है, जिसे एक ही चश्मे से देखने की जरूरत है।
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