ऑस्ट्रेलिया के हाथों पराजित होकर विश्व कप में भारत का विजय अभियान अंततः एक टीस के साथ खत्म हो गया है। यह हताशा इसलिए है कि जिस सेमी फाइनल को फाइनल की तरह देखा जा रहा था, जिस मुकाबले को ऑस्ट्रेलिया का मीडिया भी कठिन मान रहा था, और स्पिनरों की मददगार पिच होने के कारण जिस मैच में भारत की संभावनाएं अधिक बताई जा रही थीं, वह मैच उत्तरोत्तर ऑस्ट्रेलिया के पक्ष में एकतरफा झुकता चला गया। बाजार की ताकत और अपने दर्शकों की भारी संख्या भी टीम इंडिया को प्रेरित नहीं कर पाई!
पहले हमारे गेंदबाज उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे, जिस कारण ऑस्ट्रेलिया ने 328 रनों का स्कोर खड़ा किया। हमारी मजबूत बल्लेबाजी को देखते हुए यह भी कोई ऐसा स्कोर नहीं था, जिसे लांघा न जा सके; तीन सौ रनों का पीछा करते हुए सबसे अधिक बार मैच जीतने का रिकॉर्ड टीम इंडिया के ही नाम है। पर छिहत्तर रनों की ओपनिंग साझेदारी के बाद शिखर धवन का विकेट क्या गिरा, मध्यक्रम जैसे ढह गया। इसमें विराट कोहली की विफलता कचोटने वाली थी, तो जिस धोनी ने इस विश्व कप में भी लगातार चुनौतियों का सफल मुकाबला किया, रनों के बढ़ते बोझ ने उनके आत्मविश्वास को भी ध्वस्त कर दिया।
पिछला चैंपियन भारत भले ही इस बार फाइनल में नहीं खेल पाएगा, फिर भी विश्व कप में उसने जो प्रदर्शन किया है, उसकी अनदेखी नहीं कर सकते। इस टीम ने साबित किया कि वह विश्व कप में भारत की अब तक की सर्वश्रेष्ठ टीम है। क्वार्टर फाइनल सहित उसने न सिर्फ लगातार सात मैच जीते थे, बल्कि सभी विपक्षी टीमों को ऑल आउट भी किया था। इसी तरह टूर्नामेंट में सभी बल्लेबाज चले, और टीम किसी एक खिलाड़ी पर टिकी हुई नहीं थी। टीम में इतनी संख्या में विशेषज्ञ क्षेत्ररक्षक भी पहली बार थे।
इसके बावजूद एक दिन के खराब खेल ने लगातार दूसरी बार विश्व कप जीतने के उसके सपने को चकनाचूर कर दिया। फिर भी हार-जीत चूंकि खेल का स्वाभाविक हिस्सा है, इसलिए इस पराजय को खेल भावना से लेने की ही जरूरत है। आखिर यह किसने सोचा था कि ऑस्ट्रेलिया दौरे पर जो टीम इतनी दयनीय स्थिति में थी, वह विश्व कप में सेमी फाइनल तक पहुंच पाएगी! हां, यह उम्मीद जरूर करनी चाहिए कि यह पराजय भारतीय टीम के लिए सबक लेने का अवसर बनेगी।