इलाहाबाद के महाकुंभ में पवित्र मौनी अमावस्या को हुई भगदड़ ने एक बार फिर प्रशासकीय बेचारगी के साथ ही आपदा प्रबंधन की ओर ध्यान खींचा है। यह विडंबना ही है कि महीनों से कुंभ में पुख्ता इंतजाम के तमाम दावों के बावजूद यह हादसा टाला नहीं जा सका। यह सिर्फ आस्था के आगे मानवीय सीमाओं की बेबसी का मामला नहीं है।
वास्तव में कुंभ से जुड़ी आस्था सनातन है, और दुनिया यह देखकर अचंभित होती है कि कैसे एक (जन) समुद्र नदी से जा मिलता है! इसलिए इस हादसे के लिए वहां जुटी भीड़ को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कुंभ में भीड़ का जुटना तो अपेक्षित ही था, और मौनी अमावस्या को तो पहले से ही तीन करोड़ लोगों के जुटने का अनुमान था।
सवाल यह नहीं है कि यह भगदड़ क्यों हुई, कैसे हुई, इसके लिए रेलवे, स्थानीय पुलिस और मेला प्रबंधन में से कौन-कौन जिम्मेदार है? मुद्दा यह है कि ऐसे आयोजनों के बारे में जब पहले से ही पता होता है, तब उसके प्रबंधन की समुचित तैयारी क्यों नहीं की जाती। इस हादसे की जांच जब होगी, तब होगी, असली बात यह है कि हमारा तंत्र भीड़ के प्रबंधन में नाकाम साबित हुआ।
हैरत की बात है कि 23 दिसंबर, 2005 को लागू हुए आपदा प्रबंधन कानून के तहत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण तो स्थापित किया गया है, पर उसे अत्याधुनिक संसाधनों से न तो लैस किया गया है और न ही उसके पास ऐसे आयोजन के प्रबंधन की कोई रणनीति नजर आती है। कुंभ से पहले राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन की टीम ने भले ही मेलास्थल का मुआयना किया था, मगर ताजा हादसा आपदा प्रबंधन में हमारी नाकामी का ही एक उदाहरण है।
इस हादसे का एक कारण स्थानीय पुलिस, रेलवे और मेला प्रबंधन के बीच समन्वय का अभाव भी है। आखिर ऐसा कैसे हो गया कि एक ही प्लेटफॉर्म या एक ही फुटओवर ब्रिज पर हजारों लोग जुट गए। कुंभ तथा अन्य धार्मिक आयोजनों में भगदड़ की पहले भी घटनाएं हुई हैं, लेकिन लगता है कि उनसे कोई सबक नहीं सीखा गया।
इसके उलट राज्य सरकार और रेलवे अब आरोप-प्रत्यारोप में जुट गए हैं, जबकि अभी तीन पवित्र स्नान बाकी हैं। यह समझने की जरूरत है कि लोग कुंभ में मोक्ष की कामना लिए आते हैं, मौत की नहीं।