सारदा चिटफंड घोटाले की चपेट में आए पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री मतंग सिंह को कथित तौर पर सीबीआई की गिरफ्तारी से बचाने की भारी कीमत केंद्रीय गृह सचिव अनिल गोस्वामी को चुकानी पड़ी है। गोस्वामी से पहले विदेश सचिव सुजाता सिंह और डीआरडीओ के अध्यक्ष अवनीश चंदर को भी एनडीए सरकार ने हटाया था, लेकिन उसके पीछे के कारण कुछ और थे।
तकनीकी तौर पर गोस्वामी के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने की बात आई है, लेकिन वास्तव में मतंग सिंह और उनकी फोन पर हुई बातचीत के बाद एनडीए सरकार ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया है। इस मामले को दो तरह से देखने की जरूरत है। पहला यह कि नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली एनडीए सरकार ने कुछ घंटे के भीतर ही इस मामले में फैसला लेकर यह जतलाया है कि वह भ्रष्टाचार और घोटालों को लेकर बेहद गंभीर है और किसी भी रूप में इसे बर्दाश्त नहीं करेगी। इस कार्रवाई में सीबीआई की भूमिका सबसे अहम कही जा सकती है, जिसने गोस्वामी और मतंग सिंह की बातचीत से गृह मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय को अवगत कराया।
मतंग सिंह की गिरफ्तारी और गोस्वामी की विदाई से ऐसे तमाम रसूखदार लोगों को भी संदेश गया होगा, जिनके खिलाफ कोयला घोटाले या 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में या तो सीबीआई जांच चल रही है या उन्हें किसी भी रूप में संदिग्ध पाया गया है। इस मामले का दूसरा पक्ष उस सारदा चिटफंड घोटाले से जुड़ा है, जिसके फैलते जाल ने केंद्रीय गृह सचिव तक को अपनी चपेट में ले लिया। सीबीआई द्वारा गोस्वामी और मतंग सिंह की बातचीत से संबंधित एक सीडी सरकार को देने की बात आई है, जिसके ब्योरे अभी पता नहीं।
लेकिन सवाल उठता है कि क्या गोस्वामी की भूमिका सिर्फ मतंग सिंह को गिरफ्तारी से बचाने तक ही सीमित थी? वास्तव में सारदा घोटाले की निष्पक्ष जांच की जरूरत है, क्योंकि इसमें एक-एक कर सामने आती जानकारियां किसी गहरी साजिश का इशारा कर रही हैं। इस घोटाले ने पहले ही पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी की सरकार को घुटने टेकने को मजबूर कर दिए हैं और बहुत संभव है कि इसकी वजह से उनकी पार्टी में फूट ही न हो जाए। मगर इसके साथ ही एनडीए सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इस मामले में सीबीआई राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ हथियार न बने।