देवताओं से अमृत का घड़ा छीनने की असुरों की कोशिशों से कभी जिस कुंभ की शुरुआत हुई थी, उसका आज भी उसी तरह आयोजन हमारी समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा का ही एक और अद्भुत उदाहरण है। कुंभ हमारे जीवन को परिपूर्ण कर देने का प्रतीक है।
पवित्र नदियों में स्नान वैसे तो हमेशा ही हमें अलौकिक आनंद से भर देता है, लेकिन कुंभ के दौरान स्नान का अलग ही महत्व है, क्योंकि यह माना जाता है कि ऐसे अवसरों पर जल में अमृत का दुर्लभ संयोग होता है। कुंभ में स्नान का यह महत्व ही सदियों-शताब्दियों से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता आया है।
जब आवागमन के साधन इतने सुलभ नहीं थे, जब कुंभ मेलों में ठहरने की व्यवस्था आज जैसी नहीं थी और जब ठगों की गिद्ध निगाहों से बचना बहुत कठिन था, तब भी यह आस्था लाखों लोगों को कुंभ तक खींच ही लाती थी।
आज से इलाहाबाद में शुरू हुए महाकुंभ में उमड़े जनज्वार के पीछे भी यह आस्था ही है। यह आस्था हिमालय के किसी जटाजूटधारी संत को यहां ले आई है, तो बेल्जियम की किसी युवती को भी संगम किनारे हाथ जोड़े आंखें बंद किए देखा जा सकता है। भारतीय धर्म और अध्यात्म की विविधता ऐसे ही अवसरों पर अपनी संपूर्णता में सामने आती है।
यह पारंपरिक विविधता साधु-संतों की वेश-भूषा में भी दिखती है और उनकी उपासना पद्धति तथा लोकाचारों में भी। यह संगम सिर्फ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का ही नहीं है, साधु-संतों, महामंडलेश्वरों के साथ कॉरपोरेट दिग्गजों और नामचीन अंतरराष्ट्रीय शख्सियतों का भी है।
कुंभ का दायरा अगर स्नान-दान-पुण्य से आगे पर्यटन तक बढ़ गया है, तो विवादास्पद संतों का विरोध और बढ़ते प्रदूषण के खिलाफ संत समाज की ओर से उठी आवाज इस आयोजन को एक अलग पहचान देती है। जिस उत्साह के बीच इसकी शुरुआत हुई है, उसे देखते हुए यह उम्मीद करनी चाहिए कि आगामी मार्च तक यह भक्ति, समर्पण और महामिलन का ऐसा ही उत्सव बना रहेगा।
यह उम्मीद भी क्यों न करें कि यह महाकुंभ किसी विवाद का गवाह नहीं बनेगा, अव्यवस्था की कोई शिकायत नहीं आएगी, भीड़ में अबोध बच्चे और असहाय बुजुर्ग नहीं खोएंगे, और आम श्रद्धालु भी यहां से तृप्ति के साथ लौटेगा। तभी तो ऐसे आयोजनों की सार्थकता है!