दशकों के खून-खराबे के बाद दो वर्ष पूर्व ही नौ जुलाई, 2011 को सूडान से आजाद होने वाला दक्षिण सूडान एक बार फिर गृहयुद्ध की चपेट में है। इस संघर्ष में सैकड़ों लोग मारे गए हैं और करीब बीस हजार से ज्यादा लोग घर-बार छोड़कर विभिन्न जगहों पर शरण लिए हुए हैं। प्राकृतिक संसाधनों, खासकर तेल समृद्ध इस देश को व्यापक संभावनाओं वाला माना जाता है और आजादी के बाद इसके खजाने में लगातार बढ़ोतरी ही हुई है।
विस्तृत चारागाह, दलदल और उष्णकटिबंधीय जंगलों वाले इस देश के लोगों की आजीविका का आधार लंबे समय तक खेती ही थी, लेकिन अब दक्षिण सूडान की अर्थव्यवस्था मुख्यतः तेल पर निर्भर है। यह अलग बात है कि तेल समृद्ध होने के बावजूद यह अफ्रीका का सबसे कम विकसित देश है। अनुमानतः पूर्व सूडान के तेल कुल भंडार का 75 फीसदी हिस्सा दक्षिण सूडान में आ गया है, जबकि रिफाइनरी एवं पाइपलाइन सूडान में हैं। दोनों देशों के बीच तेल राजस्व के बंटवारे को लेकर अक्सर विवाद होते रहते हैं।
वैसे यहां तेल एवं सीमा विवाद ही नहीं, बल्कि घरेलू स्तर पर नस्लीय समूहों के बीच होने वाला झगड़ा भी चिंता का विषय है। भाषायी एवं नस्लीय विविधता वाले इस देश में आजादी के बाद इन झगड़ों के कारण सैकड़ों लोग मारे गए हैं और करीब एक लाख लोग विस्थापित हुए हैं। ताजा संघर्ष में भी नस्लीय झगड़े के संकेत हैं। डिंका, नुएर और सिलुक यहां के बड़े नस्लीय समूह हैं। बताया जाता है कि राष्ट्रपति सेल्वा कीर बहुसंख्यक डिंका समुदाय से हैं, जबकि वहां के पूर्व उपराष्ट्रपति रीक मेचार, जिसे कीर ने पद से हटा दिया, नुएर समुदाय से हैं। जानकारों के मुताबिक, दोनों समुदायों के बीच ताजा तनाव की मुख्य वजह यही है।