तकरीबन ढाई वर्ष पूर्व 19 दिसंबर, 2010 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच जेपीसी से कराए जाने की मांग को ठुकराते हुए खुद को लोकलेखा समिति के समक्ष प्रस्तुत करने की पेशकश करते हुए शेक्सपियर के मशहूर नाटक जूलियस-सीजर का उद्धरण दिया था।
उन्होंने कहा था कि जूलियस सीजर की पत्नी की तरह प्रधानमंत्री को भी संदेह से परे होना चाहिए। मगर कोयला घोटाले के मामले में यूपीए सरकार जिस तरह से अड़ियल रुख अख्तियार किए हुए है, उससे संदेह पुख्ता हो रहा है कि वह कुछ छिपाना चाहती है।
कोयला ब्लॉक आवंटन में हुई गड़बड़ी से संबंधित मामलों की सर्वोच्च न्यायालय में अगली सुनवाई से ऐन पहले इससे संबंधित अहम फाइलें गायब हो गई हैं और सरकार यह बताने की स्थिति में नहीं है कि आखिर यह सब कैसे हो गया!
यह सिर्फ लापरवाही का मामला नहीं है, क्योंकि इन फाइलों के बारे में जो ब्योरे आए हैं, वह काफी चौंकाने वाले हैं। सवाल यह नहीं है कि ये फाइलें 1993 से 2004 के बीच की थीं या कि 2004 के बाद की, अहम यह है कि इनमें ऐसे गहरे राज छिपे हैं, जिनके सामने नहीं आने से एक लाख 86 हजार करोड़ रुपये के इस घोटाले की जांच प्रभावित हो सकती है।
भूलना नहीं चाहिए कि सीबीआई इस घोटाले की जांच सर्वोच्च अदालत के निर्देश पर कर रही है और पहले भी जांच को प्रभावित करने की कोशिश हो चुकी है, जिसके चलते एक कानून मंत्री तक को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी है।
यूपीए सरकार विपक्ष के आरोपों को तो खारिज कर सकती है, लेकिन उसके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि यह मामला हितों के टकराव से भी जुड़ा हुआ है।
हैरत की बात यह है कि सार्वजनिक जीवन में शुचिता की बात करने वाले प्रधानमंत्री संसद में बयान देने से हिचक रहे हैं। जबकि वह संसद को भरोसे में लेकर उन संदेहों को दूर कर सकते हैं, जिनके कारण उनकी छवि पर दाग लग रहे हैं।
यदि एनडीए सरकार के समय भी कोयला ब्लॉक आवंटन में गड़बड़ियां की गई थीं, तो उन्हें भी सामने लाना चाहिए, लेकिन यह तो तभी संभव होगा, जब स्वतंत्र तरीके से जांच हो सके। सरकार को यह समझना चाहिए कि संसद में हो रहे शोरशराबे का ठीकरा विपक्ष पर फोड़कर वह अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकती।