कश्मीर के केरन सेक्टर में पिछले तेरह दिनों से चल रही मुठभेड़ केवल आतंकवादियों की तैयारियों का ही नहीं, पाकिस्तान के खतरनाक इरादों का भी पता देती है। सिर्फ यही नहीं कि मनमोहन सिंह और नवाज शरीफ की न्यूयॉर्क में मुलाकात से पहले इस घुसपैठ को अंजाम दिया गया, बल्कि सीमा पार से लगातार ऐसी कोशिशें की गईं, जिससे घुसपैठिये अपने मकसद में कामयाब हो सकें।
आतंकवादियों में पाक सेना की बॉर्डर ऐक्शन टीम के लोगों की मौजूदगी के अलावा हथियार और रसद की एक आपूर्ति लाइन के बारे में भी बताया गया, जिसे अब ध्वस्त कर देने का दावा किया जा रहा है। हमारे सेनाध्यक्ष ने आश्वस्त करते हुए कहा है कि हालात कारगिल जैसे नहीं हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि कारगिल के बाद यह सबसे बड़ी घुसपैठ है।
यह माना जा सकता है कि पाकिस्तान में नवाज शरीफ के सत्ता में लौटने और भारत के साथ बेहतर रिश्ता बनाने की प्रतिबद्धता जताने के बाद पाक सेना के दिशा-निर्देश में ऐसी एक घुसपैठ को अंजाम दिया गया हो, ताकि अमेरिका में कोई बड़ी घोषणा न की जा सके। हाल के महीनों में सीमा के उस पार से संघर्षविराम का लगातार उल्लंघन करने और आतंकी वारदातों में इस साल सुरक्षा बलों के करीब चालीस जवानों के मारे जाने को भी, जो पिछले तीन वर्षों में सर्वाधिक हैं, पाक सेना की उकसावे वाली कार्रवाई मान सकते हैं। लेकिन सत्ता में आने के बाद खुद नवाज शरीफ ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है, जिससे पता चले कि वह भारत के साथ बेहतर रिश्ता बनाने के आग्रही हैं।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में कश्मीर का मुद्दा उठाकर उन्होंने जताया है कि वह अपने कट्टर पूर्ववर्तियों के नक्शे कदम पर ही चलने वाले हैं। अब पाक उच्चायुक्त द्वारा इस घुसपैठ का खंडन भी आश्चर्यजनक नहीं है। हम सीमा पर पाकिस्तानी मंसूबों को तत्परता से नाकाम करने में तो पिछड़ते ही हैं, इस्लामाबाद को सख्त संदेश देने में भी हिचकते हैं। अपने विदेश दौरे में परंपराभंजक राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने पाकिस्तान को फटकार लगाकर यह कमी पूरी की है। इस्लामाबाद को यह बताने की जरूरत है कि बातचीत जारी रखने का मतलब यह नहीं कि उसकी नापाक हरकतों को बर्दाश्त किया जाएगा।