अगले आम चुनावों को अभी कम से कम छह महीने का वक्त है, इसलिए चुनावी सर्वेक्षणों के नतीजों को देश के भावी परिदृश्य का आईना तो नहीं कहा जा सकता, मगर इससे हवा के रुख का अंदाजा जरूर लगता है।
बीते कुछ महीनों में जितने भी चुनावी सर्वेक्षण सामने आए हैं, उनके नतीजे केंद्र में सत्तारूढ़ यूपीए के लिए खतरे की घंटी की तरह हैं, और नरेंद्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता के बावजूद एनडीए को बहुत आश्वस्त करते नहीं दिखते। कुल मिलाकर, एक ऐसा परिदृश्य सामने नजर आ रहा है, जिसमें सत्ता की चाभी ऐसे छोटे दलों के हाथों में दिख रही है, जिनके अपने अंतर्विरोध कम नहीं हैं।
बहुत संभव है कि आने वाले महीनों में, खासतौर से पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद तस्वीर कुछ साफ हो। मगर मोटे तौर पर एक बात साफ है कि यूपीए की लोकप्रियता तेजी से गिरी है, जो इन सर्वेक्षणों में प्रतिबिंबित हो रही है।
असल में यूपीए के रणनीतिकारों के लिए आने वाले समय में घोटालों, भ्रष्टाचार और नेतृत्वहीनता से उपजी नकारात्मक छवि को सुधारने की ही बड़ी चुनौती होगी। संप्रग नए सहयोगी तलाशने में नाकाम रहा है, तृणमूल और द्रमुक जैसे उसके सहयोगी भी कब के उससे दूर हो चुके हैं और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की भावी रणनीति क्या होगी, यह कहा नहीं जा सकता।
यूपीए की इस स्थिति का निश्चय ही भाजपा को लाभ मिला है, लेकिन सर्वेक्षण बताते हैं कि दिल्ली उसके लिए भी अभी दूर है! असल में भाजपा के सामने भी नए सहयोगी तलाशने की बड़ी चुनौती है; हकीकत यह है कि जद (यू) के अलग होने के बाद शरद यादव की जगह एनडीए का नया संयोजक तक नहीं नियुक्त किया जा सका है।
इन सर्वेक्षणों से एक बात तो साफ है कि अगली सरकार भी गठबंधन की हो होगी और यह गठबंधन सिद्धांतों या विचारों के आधार पर नहीं, बल्कि तात्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही बनाया जाएगा।
इसके बावजूद चुनावी सर्वेक्षणों को लेकर सवाल उठना भी स्वाभाविक है, क्योंकि एक ही चुनावी सर्वेक्षण में कम अंतर्विरोध देखने को नहीं मिलते। मसलन, प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार, पसंद की पार्टी और स्थानीय सांसद इन तीन सवालों पर ही एक सर्वेक्षण के नतीजे आपस में उलझे नजर जाते हैं।
वैसे भारतीय राजनीति क्षेत्रीय आकांक्षाओं और राजनीतिक जोड़-तोड़ के जिस दौर से गुजर रही है, उसमें सटीक राजनीतिक भविष्यवाणी करना कोई हंसी-खेल नहीं है!