चार राज्यों के चुनावी नतीजे लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए अगर खतरे की घंटी हैं, तो जीत के बावजूद भाजपा को ये बहुत आश्वस्त होने का अवसर नहीं देते। खासकर दिल्ली और छत्तीसगढ़ में उसे जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा, वह उसके लिए भी संदेश है, क्योंकि इन दोनों ही जगहों में नरेंद्र मोदी की वैसी लहर नहीं दिखी, जैसी बताई जा रही थी। लेकिन उसने दो राज्यों में सत्ता-विरोधी लहर का फायदा उठाते हुए शेष दो राज्यों में अपनी सत्ता जिस तरह बरकरार रखी, वह बड़ी उपलब्धि है।
दूसरी ओर सत्ता के सेमी-फाइनल में कांग्रेस का जो हश्र हुआ है और राहुल गांधी की जैसी भद पिटी है, वह ज्यादा देखने लायक है। छत्तीसगढ़ को छोड़ दें, तो शेष राज्यों में फैसले लेने में उन्होंने वही गलतियां कीं, जो वह पहले कर चुके हैं। दिल्ली में मुख्यमंत्री तक अपनी सीट नहीं बचा पाईं, और भाजपा व नवजात आम आदमी पार्टी के मुकाबले में कांग्रेस तीसरे नंबर पर खिसक गई!
कुछ ही महीने की चुनावी तैयारी में आप के प्रदर्शन को सिर्फ चमत्कार नहीं कह सकते, यह ढर्रे पर चलती भारतीय राजनीति में एक नए दौर का सूचक है और मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों को संदेश भी कि अगर मतदाताओं को विकल्प मिले, तो वे उनका भ्रष्टाचार और तदर्थवादी रवैया नहीं सहेंगे।
राजस्थान में अशोक गहलोत की सरकार कई वजहों से पहले ही अलोकप्रिय हो गई थी, तिस पर कुछेक दागी लोगों को टिकट दिए जाने को भी मतदाताओं ने गंभीरता से लिया। वहां राहुल गांधी की तुलना में नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ ज्यादा चुनावी सभाओं को संबोधित किया, बल्कि अपने आत्मविश्वासी आक्रामक तेवर से नए मतदाताओं को लुभाया भी।
लेकिन वह मध्य प्रदेश है, जहां शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में लगातार तीसरी विजय भाजपा के लिए मायने रखती है। वहां मुख्यमंत्री की साफ-सुथरी और जमीन से जुड़ी छवि तथा समाज के सभी वर्गों के हित में उठाए गए उनके कदमों को मतदाताओं ने तरजीह दी।
छत्तीसगढ़ में कई समीकरण इस बार भाजपा के लिए कठिन मुकाबले का इंगित कर रहे थे, लेकिन कांग्रेस के भितरघात और उसके मुकाबले मुख्यमंत्री रमन सिंह की मजबूत छवि ने लगातार तीसरी बार राज्य में भाजपा की जीत सुनिश्चित की। ये नतीजे अगर कांग्रेस में आमूलचूल बदलाव लाने की जरूरत बताते हैं, तो भाजपा को भी अधिक जिम्मेदार और जमीन से जुड़े होने का सबक देते हैं।