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बेटियों की सुरक्षा का सवाल

Mon, 02 Jun 2014 01:34 AM IST
संपादकीय/अमर उजाला, नई दिल्ली
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बदायूं की रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना अगर उत्तर प्रदेश में लड़कियों की असुरक्षा का हाल बताती है, तो यह सूबे की करीब दो साल पुरानी अखिलेश सरकार के कामकाज पर भी गंभीर टिप्पणी है। इससे पहले यह सरकार मुजफ्फरनगर की सांप्रदायिक हिंसा पर भी समय रहते अंकुश लगा पाने में विफल रही थी।
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बदायूं के गांव कटरा सआदतगंज की दो नाबालिग लड़कियों की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाने गए परिवारजनों के प्रति पुलिस वालों ने जैसी संवेदनहीनता दिखाई थी, उसी से साफ हो गया था कि राज्य में कुछ बदला नहीं है। इस दर्दनाक घटना पर देश-दुनिया की निगाहें जाने और गिरफ्तारियां होने के बाद भी कुछ दबंगों द्वारा अगर पीड़ित परिवार को धमकाए जाने के ब्योरे सच हैं, तो कल्पना की जा सकती है कि राज्य में अपराधियों के हौसले कितने बुलंद हैं और उनमें कानून-व्यवस्था का डर कितना कम। बदायूं के अलावा राज्य की कुछ और जगहों से भी हाल में बलात्कार की कई घटनाएं सामने आई हैं।

अव्वल तो औरतों की असुरक्षा ही किसी राज्य की कानून-व्यवस्था के बारे में बहुत कुछ बता देती है। तिस पर जिन्हें निशाना बनाया जा रहा है, उनमें से अधिकांश समाज के निचले तबके से हैं, जिनकी सुरक्षा के प्रति सरकार को ज्यादा संवेदनशील होना ही चाहिए। पर सक्रियता दिखाना तो दूर, इस तरह की घटनाओं के बाद कुछ रूटीन कार्रवाई कर राज्य सरकार अपना कर्तव्य समाप्त मान लेती है।
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बदायूं की घटना की सीबीआई जांच के आदेश भी सरकार ने चारों तरफ से दबाव पड़ने के बाद ही दिए हैं। उसका यह रवैया तब और हैरान करता है, जब थोड़े ही दिनों पहले लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने विकास के मुद्दे पर भरोसा जताया है। बदायूं की घटना पर समाज का उदासीन रुख भी चौंकाने वाला है। निर्भया हादसे पर मोमबत्तियां जलाने वाले लोग ऐसी त्रासदियों पर उद्वेलित क्यों नहीं होते?

उत्तर प्रदेश और देश के दूसरे इलाकों में महिलाओं की असुरक्षा और उनकी अमर्यादा पर हमारा देश आंदोलित क्यों नहीं होता? जबकि ग्रामीण इलाकों में इस तरह की लगातार घटती घटनाएं ज्यादा चिंतानजक हैं, क्योंकि इनसे  पता चलता है कि वहां अब भी शौचालय, पानी, बिजली जैसी बुनियादी सहूलियतें नहीं पहुंची हैं, स्त्री सुरक्षा की तो बात ही छोड़िए।
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