इस देश में आज भी उम्मीद की आखिरी किरण न्यायपालिका ही है। लोकतंत्र के अब तक के सफर में यह अपनी भूमिका पर तो खरी उतरी ही है, विधायिका और कार्यपालिका को भी वह समय-समय पर उनके सांविधानिक कर्तव्यों और मर्यादा की याद दिलाती रहती है।
इसी कारण मुंबई विस्फोट मामले में पहले संजय दत्त को समर्पण के लिए चार सप्ताह की मोहलत देने और उसके अगले दिन जेबुन्निसा काजी समेत चार दोषियों को राहत देने के सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले थोड़ा हैरान करते हैं।
कैंसर की मरीज होने के कारण जेबुन्निसा राहत की खास हकदार थीं। अदालत ने अब उन्हें मोहलत देकर ठीक ही किया है। लेकिन दो दिन पहले शीर्ष अदालत ने ही जेबुन्निसा के अलावा दो और दोषियों की राहत याचिका खारिज की थी।
बेशक अदालत का कोई फैसला आखिरी नहीं होता, फिर सर्वोच्च न्यायालय के पास तो किसी भी दोषी को चार सप्ताह की छूट देने का विशेष अधिकार भी है। फिर भी जेबुन्निसा द्वारा पहले मोहलत मांगने के बावजूद उन्हें संजय दत्त के बाद राहत देने के अदालती फैसले से यही संदेश गया है कि एक प्रभावशाली व्यक्ति को छूट देने के बाद जेबुन्निसा जैसों को इससे वंचित करने का बहुत आधार नहीं बनता था।
मानवीय और कानूनी आधार की दलीलें अपनी जगह सही हैं, पर ऐसा लगता है कि जेबुन्निसा को बाद में दी गई राहत पहले भी दी जा सकती थी। धारणा यही बनती है कि संजय दत्त को मोहलत न मिलती, तो शायद जेबुन्निसा भी इससे वंचित रहतीं। इससे पहले हम देख चुके हैं कि संजय दत्त की बाकी सजा माफ करवाने के लिए कैसी जबर्दस्त लॉबिंग की गई।
दिल्ली विस्फोट के दोषी देविंदर पाल सिंह भुल्लर की फांसी की सजा माफ करवाने के लिए भी इन दिनों ऐसी ही कवायद चल रही है। सवाल यह नहीं है कि भुल्लर को फांसी होनी चाहिए या नहीं, तथ्य यह है कि ऐसे मामलों में राजनीति नहीं होनी चाहिए।
वैसे भी कई वजहों से हमारी अपराध न्याय प्रणाली दोषपूर्ण बनी हुई है, तिस पर प्रभावशाली और राजनीतिक रूप से संवेदनशील व्यक्तियों की सजा माफी का दबाव बनाकर राजनीतिक वर्ग न्याय को प्रभावित करने की कोशिश करता है। उम्मीद करनी चाहिए कि न्यायपालिका ऐसी कोशिशों को सफल नहीं होने देगी।