यह विचित्र संयोग है कि दिनोंदिन ऊपर उठते सोने में अचानक गिरावट शुरू भी हुई, तो ठीक त्योहारी सीजन में, जब अपने यहां इसकी मांग तेज होने लगती है! एक ही दिन में इसके दाम में साढ़े बारह सौ रुपये की चौंकाने वाली गिरावट बताती है कि सोना शिखर से एकाएक तलहटी पर अगर न जाए, तब भी उसके दुर्दिन शुरू हो चुके हैं।
बल्कि सच तो यह है कि रुपये के अवमूल्यन के कारण सोने में गिरावट अपने यहां उतनी नहीं दिख रही, जितनी कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में है। सोने के अचानक गिरने की दो वजहें हैं। एक तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार के कमोबेश लक्षण दिखाई पड़े हैं, नतीजतन वहां निवेशक अब सोने के बजाय डॉलर, इक्विटी और शेयर बाजार का रुख करने लगे हैं।
यह अचानक नहीं है कि दुनिया भर के शेयर बाजारों की स्थिति सुधरने लगी है। निवेश मांग न होने के कारण वायदा बाजार में सोने की पूछ स्वाभाविक ही कम होने लगी है। दूसरे, आर्थिक मुश्किलों में फंसे यूरोपीय देश अपना स्वर्ण भंडार बेचकर यूरो खरीदने में लगे हैं। साइप्रस ने शुरुआत कर दी है, देर-सबेर इटली और दूसरे देश भी इस रास्ते पर चल सकते हैं।
यानी फिलहाल विश्व बाजार में सोने की बिकवाल ज्यादा हैं, जबकि खरीदार कम होते जा रहे हैं। जो लोग सोने को लगातार ऊपर जाते देख हताश थे, उनके लिए यह अच्छी खबर है। सोने के भाव गिरते रहें, तो वह जरूरतमंदों की पहुंच में आएगा। अब वे लोग भी गाढ़े वक्त में काम आने के लिए थोड़ा सोना खरीदने का साहस कर पाएंगे, जो ऊंचे भाव के कारण उम्मीद छोड़ चुके थे। लेकिन केवल उनके लिए नहीं, सोने का गिरना विश्व अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ी राहत की तरह है।
अमेरिका के साथ-साथ यूरोप की अर्थव्यवस्था भी अगर गति पकड़ती है, तो जल्दी ही तस्वीर बदलेगी। नतीजतन हमारे यहां भी उद्योगों में मांग बढ़ेगी और निर्यात बढ़ना शुरू होगा। इससे हमारी आर्थिक विकास दर से जुड़ी आशंकाओं को विराम लगेगा। सोने में निवेश घटने के साथ ही अपने यहां इसकी आयात मांग कम होगी, नतीजतन धीरे-धीरे चालू खाते का घाटा भी कम होगा। लेकिन सोने के दाम घटने से यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकते कि उसकी चमक अब वाकई खत्म हो गई है। इतिहास बताता है कि तलहटी पर पड़ा सोना भी कई बार शिखर छू चुका है।