सर्वोच्च न्यायालय ने जिस 'राइट टू रिजेक्ट' को मतदाताओं का अधिकार बताते हुए वोटिंग मशीन में इसे एक विकल्प के रूप में शामिल करने को कहा है, उसे चुनावी परिदृश्य को साफ-सुथरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम बताया जा रहा है, तो गलत नहीं है।
अगर राजनीतिक पार्टियां अड़ंगा न लगाएं, तो यह बिल्कुल संभव है कि अगले लोकसभा चुनाव या उससे पहले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में अपने प्रत्याशियों से नाखुश मतदाता किसी को वोट न डाले, और उसका परिचय भी गोपनीय रहे।
राइट टू रिजेक्ट नई चीज नहीं है। मतदान करना हमारा सांविधानिक अधिकार है, ऐसे में, उम्मीदवारों को नकारने का अधिकार भी अभिव्यक्ति के अधिकार के तहत आता है। चुनाव आयोग ने तो 2001 में ही यह प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास भेजा था, लेकिन तमाम सरकारें इसे दबाए बैठी रहीं। लोकतंत्र में प्रतिनिधि चुनने का अधिकार जब मतदाता के पास है, तो सबको खारिज करने के अधिकार से उसे कैसे वंचित किया जा सकता है! इसी मुद्दे पर 2004 में पीयूसीएल ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर की, जिस पर अब यह दूरगामी फैसला आया है।
जनप्रतिनिधियों के आचरण से क्षुब्ध मतदाताओं द्वारा सामूहिक रूप से वोट न देने का फैसला करने के कई उदाहरण हाल के वर्षों में दिखे हैं, ऐसे मतदाताओं के लिए यह फैसला एक कारगर हथियार बन सकता है। शीर्ष अदालत के ताजा फैसले के बाद राजनीतिक दलों पर साफ-सुथरे और संवेदनशील प्रत्याशी चुनने का दबाव बढ़ेगा; कायदे से यही इस फैसले का सबसे प्रासंगिक पहलू है। यह मान लेना भोलापन ही है कि इससे रातोंरात चुनावी परिदृश्य बेहतर हो जाएगा, क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था की गरिमा जनप्रतिनिधि चुने जाने में है, उन्हें खारिज करने में नहीं।
छिटपुट मामलों को छोड़ दें, तो यह बहुत व्यावहारिक इसलिए भी नहीं है कि आम मतदाता प्रत्याशियों को नहीं, राजनीतिक पार्टियों को वोट देता है। जाति, संप्रदाय, धर्म और दूसरे समीकरणों पर निर्भर देश के ऐसे मतदाताओं की खास चुनाव चिह्नों के प्रति निष्ठा भ्रष्टाचार और घोटालों के बावजूद कम नहीं होती। अलबत्ता यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हाल के वर्षों में जागरूक मतदाताओं की संख्या बढ़ी है। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए बेहतर यही होगा कि इस फैसले को शिरोधार्य करते हुए वे मतदाताओं के प्रति ज्यादा जिम्मेदार और संवेदनशील बनें।