यह समझना मुश्किल होता जा रहा है कि तोता खुद पिंजरे में बंद रहना चाहता है या उसे पिंजरे से बाहर निकलने नहीं दिया जा रहा है! कोयला घोटाले के मामले में सीबीआई की ताजा कार्रवाई से ऐसा ही आभास होता है। शीर्ष उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला और पूर्व कोयला सचिव प्रकाश चंद्र पारेख को जिस आधार पर सीबीआई ने आरोपी बनाया है, उसे लेकर सवाल उठना स्वाभाविक ही है।
यह मामला ओडिशा के झारसुगड़ा जिले की तालाबीरा-2 और तालाबीरा-3 कोयला खदान के आवंटन से जुड़ा है, जो कि सार्वजनिक क्षेत्र की दो कंपनियों नेवेली लिगनाइट और महानदी कोलफील्ड के लिए सुरक्षित थीं, जिनमें से कुछ हिस्सा ए वी बिड़ला समूह की हिंडाल्को कंपनी को आवंटित कर दिया गया। यह बताने की जरूरत नहीं है कि कोयला, गैस या स्पेक्ट्रम जैसे किसी भी तरह के प्राकृतिक संसाधन के आवंटन का फैसला; फिर उसके लिए विधायी के बजाय सिर्फ कार्यकारी कदम की जरूरत ही क्यों न हो, संबंधित विभाग का सचिव अकेले नहीं कर सकता। और इस मामले में तो कोयला मंत्रालय प्रधानमंत्री के ही अधीन था! आखिर सीबीआई ने ही 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में तत्कालीन मंत्री ए राजा के साथ दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरा को न केवल आरोपी बनाया, बल्कि उन्हें गिरफ्तार भी किया था। ऐसे में ओडिशा की खदानों का फैसला क्या अकेले पारेख ने कर लिया था?
यदि ऐसा है, तो फिर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने कोयला घोटाले के संदर्भ में उन्हें व्हीसल ब्लोअर तक कहा था, क्योंकि उन्होंने कोयला सचिव रहते 2004 में नीलामी के जरिये ही खदानों के आवंटन की पैरवी की थी। कुमार मंगलम बिड़ला का नाम आने के बाद औद्योगिक जगत में हताशा स्वाभाविक है, जिसका असर निवेश पर भी पड़ सकता है। लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि तेज आर्थिक विकास की चाहत ने प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को लूट की हद तक जायज ठहरा दिया है, जिसका नतीजा है कि एक-एक कर बड़े औद्योगिक घराने कोयला, 2जी स्पेक्ट्रम और गैस आवंटन के मामलों में शक के दायरे में आते जा रहे हैं। मगर ऐसा नहीं हो सकता कि नौकरशाह और उद्योगपति पर तो सीबीआई शिकंजा कसती जाए और सरकार अपनी जवाबदेही से बची रहे।