जनगणना के धार्मिक आंकड़ों को राजनीतिक वजहों से रोकने या जारी करने के आरोप अगर सही हैं, तो यह हमारी आज की राजनीति पर ही एक टिप्पणी है। यह बताया ही जा रहा है कि पिछली जनगणना के धार्मिक आंकड़ों को 2014 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए मनमोहन सिंह सरकार ने रोका, तो इन्हें अब जारी करने के पीछे बिहार के चुनाव को ध्रुवीकृत करने की मंशा है। पर राजनीति से परे हटकर देखें, तो जनगणना के ये आंकड़े कुछ दिलचस्प और कुछ चिंतनीय निष्कर्ष पेश करते हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, 2001 से 2011 के बीच मुस्लिम आबादी 0.8 फीसदी बढ़ी, जबकि हिंदू जनसंख्या 0.7 प्रतिशत कम हुई है। हालांकि 2001 की तुलना में 2011 में मुस्लिमों में जनसंख्या वृद्धि की दर हिंदुओं में जनसंख्या वृद्धि की दर से कम ही हुई है। अलबत्ता असम में छह की जगह नौ जिलों का मुस्लिम बहुल हो जाना और पश्चिम बंगाल में सीमांत के जिलों में मुस्लिम आबादी का बढ़ना चिंता का विषय जरूर है। पर कुल मिलाकर जनसंख्या की वृद्धि दर कम हो रही है, जो सकारात्मक संकेत है। जैसे, ईसाइयों की आबादी के स्थिर होने का मतलब धर्मांतरण पर अंकुश लगा है, तो बौद्धों की जनसंख्या घटने का अर्थ यह कि दलितों में बौद्ध बनने की प्रवृत्ति कम हुई है। यानी हाशिये के लोगों तक विकास की लहर पहुंच रही है।
एक दूसरा आंकड़ा इस दिलचस्प निष्कर्ष तक ले जाता है कि आबादी मजहब के हिसाब से नहीं, क्षेत्रों के हिसाब से बढ़-घट रही है। यह इसी का नतीजा है कि ईसाइयों का जो लिंगानुपात केरल में बेहतर है, वह पंजाब-हरियाणा में चिंताजनक स्तर पर है; हिंदुओं में लिंगानुपात उत्तर भारतीय राज्यों में उम्मीद के अनुरूप खराब है, तो केरल में ईसाई समुदाय से भी बेहतर है, और छत्तीसगढ़ में सभी समुदायों में लिंगानुपात बेहतर है, जिसे वहां के आदिवासी समुदाय के प्रभाव का नतीजा बताया जा रहा है।
पर हिंदू जनसंख्या के 80 फीसदी से कम होने पर चिंता करने वालों के लिए उससे भी अधिक चिंतनीय तथ्य यह होना चाहिए कि विगत एक दशक में हिंदुओं को छोड़कर सभी समुदायों में लिंगानुपात सुधरा है। कुरेदने वाला सवाल तो यह भी होना चाहिए कि मुस्लिमों की तुलना में देश के बहुसंख्यक हिंदुओं में बाल मृत्यु दर अधिक और औसत उम्र कम क्यों है।