केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भ्रष्टाचार निरोधक संशोधन विधेयक में कड़े बदलाव करते हुए भ्रष्टाचार को गंभीर अपराध की श्रेणी में शामिल करने को मंजूरी दी है, जिसे सुशासन की दिशा में बड़ी पहल कहा जा सकता है। हालांकि अभी इन संशोधनों को संसद की मंजूरी की जरूरत है और उसके बाद ही यह नया संशोधित कानून अस्तित्व में आ सकेगा।
मोदी सरकार को यह बखूबी पता है कि पिछले वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली जीत में भ्रष्टाचार का मुद्दा सबसे बड़ा कारण था। वास्तव में भ्रष्टाचार सिर्फ एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भर नहीं है, बल्कि इससे जहां एक ओर आम लोग पीड़ित हैं, वहीं दूसरी ओर इसके कारण विदेश में देश की छवि खराब हुई है, और कारोबारी माहौल तथा निवेश प्रभावित हुआ है। अधिक दिन नहीं हुए, जब यूपीए सरकार के समय हुए कोयला और 2जी स्पेक्ट्रम घोटालों के कारण रेटिंग एजेंसियां भारत के खिलाफ राय दे रही थीं। हालत यह है कि आज भी भारत ग्लोबल करप्शन परसेप्शन इंडेक्स में 217 देशों की सूची में 85वें नंबर पर है!
दरअसल भारत में भ्रष्टाचार ने संस्थागत रूप ले लिया है, जिसे तोड़ना बड़ी चुनौती है। प्रस्तावित कानून में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में न केवल सजा की न्यूनतम अवधि को छह माह से बढ़ाकर पांच वर्ष किया जा रहा है, बल्कि अधिकतम सजा भी पांच वर्ष से बढ़ाकर सात वर्ष कर दी गई है। यही नहीं, महंगे उपहार लेने और देने को भी रिश्वत की श्रेणी में लाया गया है, जिससे निजी क्षेत्र के भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लग सकेगा।
प्रस्तावित कानून का एक अहम बिंदु यह भी है कि इसमें भ्रष्टाचार के मामलों की सुनवाई दो वर्ष में पूरी करने का प्रावधान है। इससे भ्रष्टाचार के लंबित मामलों को निपटाने में मदद मिलेगी, पर सवाल यह है कि क्या ऐसा करने के लिए हमारा न्यायिक तंत्र पर्याप्त है। 2013 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अकेले सीबीआई की विशेष अदालतों में ही उस समय तक करीब सात हजार मामले लंबित थे। यही नहीं, एक अन्य रिपोर्ट यह भी बताती है कि भ्रष्टाचार के मामलों में सजा देने की दर 21 फीसदी है।
लिहाजा, नए कानून के साथ ही न्यायिक ढांचे को भी दुरुस्त करने की जरूरत होगी और रिक्त न्यायिक पदों पर भर्तियों में भी तत्परता लानी होगी। इसके साथ ही जरूरत एक पारदर्शी कार्यसंस्कृति विकसित करने की भी है।