भारतीय रिजर्व बैंक के नए गवर्नर रघुराम राजन ने अपनी प्राथमिकताएं यों तो पहले ही बता दी थीं और अब मौद्रिक नीति की मध्यावधि समीक्षा के जरिये उन्होंने जता दिया है कि वह सुनेंगे तो सबकी, मगर करेंगे वही, जो उन्हें ठीक जंचेगा। उद्योग जगत की तमाम उम्मीदों के विपरीत राजन ने रेपो दर में 0.25 फीसदी की वृद्धि की है, जिसका असर बैंक से लिए जाने वाले कर्जों पर पड़ेगा।
असल में, त्योहारों के मौसम में बैंकों की यही सबसे बड़ी चिंता है कि रेपो दर बढ़ने का असर रीयल एस्टेट और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों पर पड़ सकता है। शायद यही वजह है कि जो शेयर बाजार कल अमेरिकी फेडरल रिजर्व के प्रोत्साहन पैकेज जारी रखने के कदम से बल्लियों उछल पड़ा था, आज फिर पांच सौ अंक तक नीचे जा गिरा। मगर, नए गवर्नर का यह कदम अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिहाज से अहम है, क्योंकि इससे लगातार बढ़ रही महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
खुद राजन ने कहा है कि थोक महंगाई दर के अनुमान से अधिक रहने का अंदेशा है और खुदरा महंगाई कई वर्षों से ऊंची बनी हुई है, ऐसे में अगर अभी कड़े कदम न उठाए गए, तो महंगाई और बढ़ सकती है! फिर यह भी देखना चाहिए कि बीते दो वर्षों के दौरान अर्थव्यवस्था हिचकोले खाती रही है, इसके बावजूद रिजर्व बैंक ने रेपो दर नहीं बढ़ाई थी। असल में यह चिंता सरकार को करनी चाहिए कि क्या वजह है कि विकास दर के उसके सारे अनुमान ध्वस्त होते जा रहे हैं और वह देश में निवेश के लायक माहौल नहीं बना सक रही है। रिजर्व बैंक तो इसमें एक हद तक ही मददगार हो सकता है, पहल तो सरकार को ही करनी पड़ेगी।
इसके बावजूद राजन की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उन्हें मौद्रिक नीति के साथ ही अनुकूल वित्तीय माहौल बनाना है। राजन ने भरोसा जताया है कि यूरोप, ब्रिटेन और जापान की अर्थव्यवस्थाओं में तेजी आई है, इससे हमारे निर्यात को मदद मिल सकती है। जाहिर है, निर्यात बढ़ने से राजकोषीय घाटे को कम करने में मदद मिलेगी, जिसने अर्थव्यवस्था का कबाड़ा कर रखा है।
मगर आंकड़ों और नीतियों में मुद्रास्फीति चाहे जिस रूप में दिखाई दे, यदि आम उपभोक्ता को इससे राहत नहीं मिलती है, तो ऐसी सारी कवायदें बेमानी साबित हो जाएंगी, और शायद चुनावी वर्ष में सरकार की भी यही चिंता होगी। वास्तव में 'राजन प्रभाव' का असली असर देखने के लिए अभी थोड़ा और इंतजार करना पड़ेगा।