रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन उन विरल अर्थशास्त्रियों में से हैं, जिन्होंने 2008 की आर्थिक मंदी की आहट भांप ली थी। इसलिए मौजूदा वैश्विक आर्थिक परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए जब वह बीती सदी के तीसरे दशक की महामंदी की वापसी की आशंका जता रहे हैं, तो उसे बिल्कुल खारिज भी नहीं किया जा सकता। लंदन बिजनेस स्कूल में उनके भाषण को इसलिए गंभीरता से लिया भी गया है।
उनकी चिंता का कारण विकसित देशों की मौद्रिक नीतियां हैं, जिनका खामियाजा सबको भुगतना पड़ सकता है। आर्थिक सुस्ती के बीच केंद्रीय बैंकों पर विकास दर बढ़ाने का भीषण दबाव बना है, जिसके तहत न सिर्फ ब्याज दर कम की जाती है, बल्कि कर्ज देने के प्रावधान भी उत्तरोत्तर उदार किए गए हैं। कर्ज के बदले केंद्रीय बैंकों के पास जमाराशि रखने के प्रावधान को महत्वहीन करने के खतरे हैं।
2008 की मंदी में अमेरिका-यूरोप के बैंक दिवालिया हुए थे, तो इसके पीछे यह एक वजह थी। शुक्र है कि अपने यहां कर्ज देने के रिजर्व बैंक के प्रावधान अब भी काफी सख्त हैं, इसलिए अनहोनी की वैसी आशंका नहीं। पर सिर्फ इस वजह से नहीं, राजन की चिंता वस्तुतः मुद्राओं का अवमूल्यन करने की कोशिश के कारण भी है। मुद्रा का अवमूल्यन कर एक देश अपना निर्यात बढ़ाता है, तो दूसरे देश को नुकसान होता है, मजबूरन उसे भी इस रास्ते पर चलना पड़ता है।
महामंदी के दौर में तब की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी मुद्राओं का अवमूल्यन करने की होड़ मची थी। राजन ने हालांकि किसी का नाम नहीं लिया है, पर यूरो (यूरोपीय संघ) और येन (जापान) के अवमूल्यन को इस संदर्भ में खासकर देखा जा सकता है। वह इसीलिए जोर देकर खेल के नियम बदलने की बात कर रहे हैं। बेशक भारत इस मंदी की छाया में नहीं है।
बहुविध आंकड़े ही नहीं, खुद रघुराम राजन भी स्वीकार करते हैं कि पिछले दो वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था और मजबूत हुई है। पर भूमंडलीकृत विश्व में अगर विकसित अर्थव्यवस्थाएं मुश्किलों में घिर जाएं, तो भारत उनके असर से किस तरह बचा रह सकता है! राजन ने पहले भी कहा था कि जब हाथी लड़ते हैं, तो नुकसान घास को भी होता है। चिंता की बात यही है।