जिस दिन राष्ट्रीय राजधानी में कुछ किशोरों ने दिन-दहाड़े एक युवक की हत्या कर डाली, ठीक उसी दिन किशोर न्याय अधिनियम में संशोधन को मंजूरी देने का केंद्रीय कैबिनेट का फैसला क्या महज संयोग है? संसद से पारित हो जाने पर मौजूदा कानून में बदलाव यह आएगा कि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड किशोरों के अपराध की गंभीरता देखकर यह तय करेगा कि उन्हें सुधार गृह में भेजा जाएगा या सामान्य अदालत में उनका मामला चलेगा। जबकि अभी जो कानून है, उसमें अट्ठारह वर्ष से कम उम्र के किशोरों को उनके जुर्म की सजा सुधार गृह में रहकर भुगतनी पड़ती है।
किशोर न्याय अधिनियम में बदलाव की यह पहल दरअसल समय की मांग है। सच्चाई यह है कि हाल के वर्षों में गंभीर अपराधों में किशोरों की संलिप्तता की दर चौंकाने की हद तक बढ़ी है। सिर्फ यही नहीं कि अपराधों को अंजाम देने में अब उनकी उम्र आड़े नहीं आती, बल्कि जघन्य अपराधों में इनकी संलिप्तता कई बार पेशेवर अपराधियों को भी पीछे छोड़ देती है। दिल्ली गैंगरेप मामले में एक नाबालिग के पकड़े जाने पर किशोर न्याय अधिनियम में बदलाव की व्यापक आवाज उठी थी। खुद सर्वोच्च न्यायालय कह चुका है कि किशोरों द्वारा अंजाम दिए जाने वाले गंभीर और कम गंभीर अपराधों के बीच फर्क करना चाहिए। ये तमाम आवाजें इसी की तस्दीक करती थीं कि समय के अनुरूप किशोर अपराध कानून को बदलना चाहिए।
पर यह बदलाव इतना भी कठोर नहीं होना चाहिए कि नाबालिग अपराधियों के सुधरने की संभावना ही खत्म हो जाए। इस लिहाज से अच्छा है कि नए कानून में भी किशोर अपराधियों के लिए उम्रकैद या फांसी की सजा नहीं होगी। न ही नाबालिग की उम्र सीमा घटाने की मांग पर मोहर लगाई गई है। गौरतलब है कि दिल्ली गैंगरेप के बाद यौन हिंसा के खिलाफ सख्त कानून बनाते हुए जस्टिस जे एस वर्मा समिति ने भी नाबालिग की उम्र सीमा घटाने की मांग तो नहीं ही मानी थी, उसने यह भी बताया था कि यह मांग मान लेने के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं।
कानून में बदलाव की इच्छाशक्ति दिखाते हुए भी सरकार ने इस मामले की संवेदनशीलता का पूरा ध्यान रखा है। चूंकि नए कानून में भी अपराध की गंभीरता जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ही तय करेगा, ऐसे में इस आशंका का भी कोई आधार नहीं है कि प्रस्तावित कानून कठोर है या किशोरों को सुधरने का मौका नहीं देगा।