विश्व कप फुटबॉल शुरू होने से ठीक पहले ब्राजील में आंदोलनों ने जो रूप लिया है, वह चिंताजनक तो है ही, लगता है कि विरोधियों के प्रति सख्ती जताकर राष्ट्रपति डिल्मा रोसेफ ने राजनीतिक खतरा भी मोल ले लिया है। यह विरोध जारी रहा, तो आगामी अक्तूबर के चुनाव में उन्हें सत्ता से बाहर होना पड़ सकता है!
गौरतलब है कि पिछले एक साल में विरोध प्रदर्शनों में वहां सत्ताईस लोगों की जान गई है। ब्राजील को जब फुटबॉल विश्व कप की मेजबानी मिली थी, तब उसे राष्ट्रीय गौरव के रूप में देखा गया था, पर आज दस में से छह आदमी इसके खिलाफ है। बृहस्पतिवार को साओ पाउलो में हड़ताल को सफल बनाकर विरोधियों ने अपनी ताकत भी दिखा दी है।
व्यापक अर्थ में देखें, तो यह विरोध इस आयोजन से अधिक गरीबों की उपेक्षा और उनकी सामाजिक बदहाली से उपजा है। पहले बताया गया था कि विश्व कप के लिए स्टेडियम और दूसरी आधारभूत संरचनाओं के निर्माण में निजी पूंजी लगेगी। पर इन निर्माण कार्यों में न सिर्फ करदाताओं की गाढ़ी कमाई खर्च हो रही है, बल्कि इनमें भारी भ्रष्टाचार हुआ है, और निर्माण कार्य भी समय पर पूरे नहीं हुए। यह पूरा प्रसंग राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान भारत की कहानी से बहुत मिलता-जुलता है। विश्व कप की तैयारी पर पूरा जोर होने के कारण ब्राजील के कई शहरों की परिवहन व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया जा सका है।
ब्राजील का यह हाल दरअसल उसकी दोहरी अर्थनीति का भी नतीजा है; उदार अर्थनीति के जरिये उसने प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी की है, तो भारी आयात शुल्क के जरिये वह अपने बाजार को बचाने की कोशिश में भी है। एक विशाल मध्यवर्ग के उभरने से वस्तुओं के दाम आसमान पर हैं, तो सोलह फीसदी गरीब आबादी कल्याणकारी योजनाएं, मुफ्त परिवहन सेवा और मुफ्त आवास चाहती है। यह सारा तामझाम उसके लिए फिजूलखर्ची की तरह है।
विश्व कप फुटबॉल ब्राजील की प्रतिष्ठा का सवाल तो है ही, चौंसठ साल बाद इसका आयोजन पेले की पीढ़ी के लिए एक भावुक अवसर भी है। पर युवा पीढ़ी भावनाओं में नहीं, यथार्थ में यकीन करती है। लिहाजा अगर इसे बाधाओं और विरोधों से बचाए रखना है, तो नीति-नियंताओं को संतुलनकारी रवैया अपनाना होगा।