महंगाई के ताजा आंकड़े पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ी हुई कीमतों से परेशान आम आदमी की मुश्किलें और बढ़ाने ही वाले हैं। जिस तेजी से सब्जियों, खासतौर से प्याज के दाम बढ़े हैं, उससे लगता है कि सरकार का इसकी कीमतों पर कोई नियंत्रण नहीं रहा। जरूरी खाद्य सामान की बेकाबू होती कीमतों ने अधिसंख्यक भारतीयों के घरेलू बजट को पूरी तरह से बिगाड़ दिया है।
अमूमन होना तो यह चाहिए कि अच्छे मानसून की वजह से सब्जियों और प्याज के दाम गिरने चाहिए, लेकिन अभी बाजार का जो हाल है, उसमें कम से कम एक पखवाड़े तक स्थिति सुधरने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। बल्कि राजनीतिक रूप से संवेदनशील प्याज के मामले में सरकार की बेरुखी ही देखी जा सकती है, जिसके पास इस बात का कोई ठोस जवाब नहीं है कि आखिर वह इसकी कीमत को नियंत्रित क्यों नहीं कर पा रही है।
इसके उलट उसके मंत्री निरीहता के साथ इसके लिए जमाखोरों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। जबकि हर वर्ष इस मौसम में ऐसी स्थिति बन जाती है, जब प्याज की नई फसल के मंडी तक पहुंचने से पहले जमाखोर बाजार में कृत्रिम कमी पैदा कर इसके दाम बढ़ा देते हैं। सवाल है कि इस जमाखोरी को रोकना किसकी जिम्मेदारी है।
कृषि मंत्री शरद पवार चाहे जितने भी दावे करें कि प्याज की बढ़ी हुई कीमतों का लाभ किसानों को होता है, लेकिन हकीकत कुछ और है। दरअसल मंडियों पर अंग्रेजों के जमाने के एक कानून के तहत गठित की जाने वाली कृषि उत्पाद विपणन समितियों का कब्जा है, जिनके आगे झुकना किसानों की मजबूरी है। देश में प्याज की सबसे बड़ी मंडी लासलगांव (महाराष्ट्र) में इन समितियों के दबाव के कारण ही इस हफ्ते प्याज के दाम 5,300 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गए हैं! जो वहां से निकलते-निकलते खुदरा बाजार में 70 और 80 रुपये प्रति किलोग्राम तक हो जाते हैं।
असल में प्याज ही नहीं, अन्य कृषि उत्पादों के मामले में भी सरकार की नीतियों में भारी खोट नजर आता है, जिसका खामियाजा अंततः किसानों और आम उपभोक्ताओं, दोनों को उठाना पड़ता है। मगर इसके साथ ही यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इसी प्याज के कारण अतीत में एक सरकार तक को जाना पड़ा है, और अब एक बार फिर चुनाव सामने हैं!