आवश्यकता निवेश की जरूरतों और बड़ी परियोजनाओं से प्रभावित लोगों के हितों के बीच संतुलन बनाने की है, जिसकी कमी फिलहाल नजर आती है।
जयंती नटराजन के अचानक इस्तीफे के बाद से वन और पर्यावरण मंत्रालय का भी काम देख रहे वीरप्पा मोइली ने महज 20 दिनों के भीतर जिस तरह से डेढ़ लाख करोड़ की परियोजनाओं को मंजूरी दी है, उसमें एक तरह की जल्दबाजी के साथ ही यूपीए सरकार के अंतर्विरोध भी नजर आ रहे हैं। इन परियोजनाओं में ओडिशा में प्रस्तावित दक्षिण कोरियाई इस्पात कंपनी पॉस्को की 52,000 करोड़ रुपये की परियोजना भी है, जो आठ वर्षों से पर्यावरण की मंजूरी के लिए लटकी हुई थी। असल में दो दशक पहले नई आर्थिक नीति और उदारीकरण की प्रक्रिया के शुरू होने के बाद से विकास की अवधारणा ही बदल गई है।
विकास के इस मॉडल का पहिया बड़ी परियोजनाओं और बड़े संयंत्रों से घूमता है, जिनके लिए जमीन से लेकर पर्यावरण और वन विभाग की मंजूरी तक की जरूरत पड़ती है। इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि ऐसी परियोजनाओं का सर्वाधिक प्रभाव आदिवासियों और ग्रामीणों पर पड़ता है, क्योंकि अंततः उन्हें ही अपनी जमीन से उखड़ना पड़ता है।
सड़क, बिजली, लोहा और कोयला जैसी परियोजनाएं विकास के इस मॉडल का अहम हिस्सा हैं, जिसमें भारी निवेश की जरूरत पड़ती है; मगर बीते दो-ढाई वर्षों के दौरान यूपीए सरकार की नीतिगत जड़ता के कारण निवेश ठप पड़ा हुआ है। दरअसल, आवश्यकता निवेश की जरूरतों और ऐसी परियोजनाओं से प्रभावित लोगों के हितों के बीच संतुलन बनाने की है, जिसकी फिलहाल कमी नजर आती है। हैरत की बात है कि यूपीए सरकार ने निवेश मामलों की कैबिनेट समिति बना रखी है, इसके बावजूद बड़ी परियोजनाओं पर फैसले लेने में वह देर करती रही है।
यही नहीं, सरकार के भीतर सामूहिक जिम्मेदारी का भी अभाव दिखता है, वरना ऐसा कैसे हो सकता है कि सारी बड़ी परियोजनाओं के लटकने का ठीकरा एक या दो मंत्रियों पर थोप दिया जाए! आखिर नटराजन से पहले जयराम रमेश को भी वन और पर्यावरण मंत्रालय से हटाया गया था, क्योंकि उद्योग जगत और निवेशक उन्हें भी रोड़ा मान रहे थे। मोइली कह रहे हैं कि वह एक महीने के भीतर सारी परियोजनाओं को मंजूरी दे देंगे, मगर यूपीए सरकार की मुश्किल यह है कि उसकी छवि पहले ही काफी खराब हो चुकी है और अब उसके पास ज्यादा वक्त भी नहीं बचा है।