उत्तर प्रदेश में मुरादाबाद जिले के कांठ को सांप्रदायिक हिंसा की नई प्रयोगशाला बनाने की राजनीतिक कोशिश जितनी दुर्भाग्यपूर्ण है, इस बेहद संवेदनशील मुद्दे पर राज्य सरकार का रवैया उससे कम दुखद नहीं है। सूबे में एक के बाद एक होती सांप्रदायिक हिंसा की घटना के बावजूद न प्रशासन-व्यवस्था के सजग-संवेदनशील होने का कोई प्रमाण मिला है, न ही राज्य सरकार के सबक सीखने का कोई प्रभावी सुबूत अब तक दिखाई पड़ा है।
कांठ में एक मंदिर में लगे लाउडस्पीकर को स्थानीय पुलिस ने जिस तरह मुद्दा बनाया, उससे शुरुआत में ही बचा जाता, तो शायद यह नौबत ही न आती। पर सांप्रदायिक सद्भाव बहाल करने के बजाय इस तरह का माहौल बनाया गया, जिससे स्थिति बिगड़े। वैसे में जो होना था, वही हुआ। प्रशासनिक कमी का आलम यह कि इस मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाने बाहर से लोग आ गए और पथराव में डीएम की आंखों में गंभीर चोट पहुंची। पुलिस के आला अधिकारी अगर डिप्टी कलेक्टर को राजनीतिक कार्यकर्ता समझकर निशाना बनाएं या सांप्रदायिक हिंसा के लिए सीधे-सीधे किसी राजनीतिक पार्टी को जिम्मेदार ठहराएं, तो इसी से उनकी भूमिका समझ में आती है।
कांठ की मौजूदा स्थिति के लिए उतने ही जिम्मेदार वे लोग हैं, जो बाहर से इस विवाद को हवा देने आए थे। यह ठीक है कि कांठ के उस गांव में स्थिति बिगड़ गई थी। इसके बावजूद वह विवाद उस गांव का आंतरिक मामला था, इसलिए बेहतर होता कि उसे स्थानीय तौर पर ही सुलझाने की कोशिश की जाती। इसके बजाय विवाद को भड़काने की सुनियोजित कोशिश हुई। उन नेताओं की आवाजाही शुरू हो गई, जो सांप्रदायिक हिंसा को हवा-पानी देने के लिए जाने जाते हैं। बाहर से आए लोग तो चले गए, पर अब भुगतना स्थानीय लोगों को ही पड़ रहा है।
कांठ रेलवे स्टेशन पर घंटों गाड़ी नहीं चली, वहां के बाजार कई दिनों से बंद हैं, जिससे व्यापारियों को भी नुकसान हो रहा है तथा आम लोगों को भी, और इलाके के लोग दहशत के मारे घर छोड़कर भाग रहे हैं, तो यह उन्हीं की परेशानी है, जिसे बांटने वाला कोई नहीं। कांठ की घटना को राजनीतिक तौर पर भुनाने की कोशिश में आए नेताओं ने अब वहां के लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया है। सूबे को सांप्रदायिक तौर पर ध्रुवीकृत करने की कोशिशें अब स्वाभाविक तौर पर बढ़ेंगी, पर ऐसी कवायदों को विफल करना अखिलेश सरकार का कर्तव्य है।