पश्चिम उत्तर प्रदेश में फैली सांप्रदायिकता की आग ने इस किसान बहुल इलाके के सामाजिक ताने-बाने को तो नुकसान पहुंचाया ही है, इसने तमाम राजनीतिक दलों को भी पूरी तरह बेनकाब कर दिया है।
यह ऐसी आग है, जिसमें सूबे में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी से लेकर लखनऊ के रास्ते से दिल्ली का सपना देखने वाली भाजपा, और अपना दामन बचाने की कोशिश में जुटी कांग्रेस से लेकर नए सिरे से प्रासंगिक बनने के अवसर तलाश रही बसपा तक सभी दल झुलसे नजर आ रहे हैं!
यदि 27 अगस्त की छेड़छाड़ की एक घटना के हिंसक रूप लेने के बाद अखिलेश यादव की सरकार स्थिति को संभाल नहीं पाने के लिए जिम्मेदार है, तो फिर केंद्र की यूपीए सरकार की जिम्मेदारी क्या सिर्फ सांप्रदायिक तनाव की चेतावनी देने और दंगा फैलने के बाद सेना भेजने तक सीमित हो जाती है?
यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जितनी खतरनाक अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति होती है, उससे कम खतरनाक बहुसंख्यक ध्रुवीकरण की राजनीति नहीं होती। वहां कुछ महीने से जाट और मुस्लिम किसानों को तोड़ने की कोशिश हो रही थी। और यदि ये आशंकाएं जताई जा रही हैं कि स्थिति को जानबूझकर बिगड़ने दिया गया, तो इसका सर्वाधिक नुकसान मुलायम सिंह यादव को ही उठाना पड़ सकता है, जिसकी एक झलक मुख्यमंत्री अखिलेश को नजर आई होगी, जब उन्हें दंगाग्रस्त इलाके में विरोध का सामना करना पड़ा।
अफसोस इस बात का भी है कि प्रधानमंत्री के साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी का इन इलाकों का दौरा भी महज औपचारिक बनकर रह गया। मुजफ्फरनगर के आसपास बेशक स्थिति पहले से बेहतर हुई है, लेकिन जख्मों को भरने में वक्त लगेगा।
यह हैरत की बात है कि राजनीतिक टकराव के कारण सांप्रदायिक हिंसा से निपटने की कोई कारगर नीति नहीं बनाई जा सकी है। इससे निपटने के लिए 2005 से एक कानून पर बात हो रही है, जिसमें कई बार संशोधन हो चुका है, लेकिन वह अमल में नहीं आ सका है।
बहुत संभव है कि 23 सितंबर को होने वाली राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में यह मसला फिर उठे, लेकिन कानून से कहीं अधिक राजनीतिक समन्वय की जरूरत है, जिसका फिलहाल अभाव दिख रहा है।