ममता बनर्जी की राजनीति में लगता है कि विरोध के लिए कोई जगह नहीं है, बावजूद इसके कि वह खुद सड़क से संघर्ष करते हुए राइटर्स बिल्डिंग तक पहुंची हैं। उन्हें हर वह शख्स विरोधी लगता है, जो उनकी या उनकी सरकार की आलोचना करता है।
चौबीस परगना जिले के बारासात के कामदुनी में एक छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार और फिर उसकी हत्या कर दिए जाने की घटना के बाद आम लोगों के गुस्से को भी उन्होंने राजनीति के अपने इसी चश्मे से देखा है।
बजाय इसके उन्हें इस पर गौर करना चाहिए था कि आखिर पश्चिम बंगाल में महिलाओं के खिलाफ अपराध के आंकड़े नीचे क्यों नहीं आ रहे हैं। बारासात की घटना अपवाद नहीं है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 2012 में महिलाओं के खिलाफ अपराध की सर्वाधिक घटनाएं पश्चिम बंगाल में दर्ज की गईं!
निश्चय ही माकपा के 34 बरस के शासन के बाद उन्हें विरासत में जो राजनीतिक व्यवस्था मिली, उसे बदलना आसान नहीं है, जिसमें या तो आप हमारी तरफ हैं, या उनकी तरफ। वह अपने शुभचिंतकों, आलोचकों और विरोधियों में फर्क नहीं कर पा रही हैं।
उन्हें सोचना चाहिए कि जो कलाकार और बुद्धिजीवी माकपा के शासन के खिलाफ संघर्ष में उनके साथ खड़े थे, उन्हें आखिर अब तृणमूल शासन के खिलाफ क्यों सड़कों पर उतरना पड़ रहा है? इसमें दो राय नहीं कि ममता बनर्जी लोकप्रिय राजनीति पर यकीन नहीं करतीं, लेकिन उन्हें जमीनी हकीकत को भी स्वीकार करना चाहिए।
बेशक उन्होंने सिविल सोसाइटी से अपराध को कम करने के लिए मदद मांगी है, लेकिन कानून व्यवस्था को दुरुस्त रखना उनकी सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। मगर बारासात की घटना के बाद उन्होंने अजीब-सा तर्क दिया कि पिछली लेफ्ट सरकार को अपने शासन के दौरान और अधिक पुलिस थाने खोलने चाहिए थे।
उस छात्रा के साथ हुई बर्बरता के जो ब्योरे आए हैं, उसने दिल्ली में पैरामेडिकल छात्रा के साथ हुई सामूहिक बलात्कार की घटना की याद दिला दी, जिसमें उसकी मौत तक हो गई थी। जाहिर है, दो वर्ष सत्ता में रहने के बाद वह अपनी हर नाकामी का ठीकरा माकपा पर नहीं फोड़ सकतीं।