फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

विकास की बैठक में राजनीति

विज्ञापन
विज्ञापन
राष्ट्रीय विकास परिषद की सालाना बैठकें अब आपसी तालमेल के बजाय घनघोर असहमति के लिए ही ज्यादा जानी जाती हैं। जिस परिषद को केंद्र और राज्यों के बीच सर्वोच्च नीति निर्धारक मंच माना जाता है, उसकी बैठकों में मुख्यमंत्रियों का सोते पाया जाना या उनका गुस्से से उठकर चले जाना भी अब शायद ही किसी को चौंकाता हो। यह सच है कि राजनीतिक और आर्थिक लाचारी का परिचय देती केंद्र सरकार संघीय ढांचे का पालन करने में भी उत्तरोतर विफल साबित हुई है।
विज्ञापन


सवाल उठता है कि भेदभाव का आरोप हमेशा विपक्षी राज्य सरकारें ही क्यों लगाती हैं। राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठकों में राज्य सरकारों द्वारा असंतोष व्यक्त करने का मौका आना ही क्यों चाहिए? केंद्र सरकार की ओर से समय रहते ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं की जाती, जिससे कि ऐसे महत्वपूर्ण अवसर व्यर्थ के विवाद में न बदलें? पर विरोधी मुख्यमंत्रियों के रवैये की भी बहुत सराहना नहीं की जा सकती।

ममता बनर्जी ने इस बार की बैठक में शिरकत नहीं की, क्योंकि पश्चिम बंगाल को वित्तीय मदद देने की उनकी मांग को केंद्र ने अनसुनी कर दी है। पर यही ममता पिछली बार की बैठक में थीं, जबकि तब से अब तक केंद्र के रवैये में बदलाव नहीं आया है। जयललिता बैठक से इसलिए बाहर निकल आईं, क्योंकि वक्ताओं के लिए आवंटित दस मिनट का समय उन्हें अपमानजनक लगा! एक दिन की बैठक में प्रधानमंत्री, राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों के लगभग पैंतीस प्रतिनिधियों, योजना आयोग के उपाध्यक्ष तथा वित्त और कृषि मंत्रियों को अपनी बात रखने का अवसर देने के लिए इससे अधिक वक्त क्या वाकई दिया जा सकता है!
विज्ञापन


नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी ने अपने राज्यों में विकास की अमिट इबारत लिखी है। एक राज्य सामाजिक मोर्चे पर पिछड़ा होने के बावजूद विकास की शानदार कहानी कह रहा है, तो दूसरा बीमारू राज्य की पहचान से बाहर निकल आया है। इसके बावजूद एक मुख्यमंत्री अपने राज्य को विशेष दर्जा देने की मांग कर रहा है, तो दूसरा वैश्विक मंदी की सच्चाई नकारकर गुजरात मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने के तर्क गढ़ रहा है। ऐसे में 12वीं पंचवर्षीय योजना को अंतिम रूप देने का लक्ष्य कहीं पीछे छूट गया लगता है।   
विज्ञापन


विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें