श्रीलंका की एक अदालत ने चार वर्ष पूर्व गिरफ्तार किए गए पांच तमिल मछुआरों को कथित तौर पर मादक पदार्थ रखने का दोषी पाकर मृत्युदंड की सजा सुनाई है, जिससे पता चलता है कि तमिल मछुआरों का मामला कितना जटिल हो गया है।
भारत सरकार ने ऊपरी अदालत में इस फैसले को चुनौती देने का आश्वासन दिया है, लेकिन इस मामले ने भारत और श्रीलंका के बीच स्थित अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा और मछुआरों से जुड़ी पुरानी समस्या की ओर ध्यान खींचा है। श्रीलंका के तमिलों के उत्पीड़न के साथ ही उसके नौसैनिकों द्वारा तमिल मछुआरों को गिरफ्तार करने और उनकी नौकाएं जब्त करने की वजह से दोनों देशों के बीच पहले भी कई बार तनाव हो चुका है।
इसके अलावा केंद्र सरकार और तमिलनाडु सरकार के बीच भी टकराव की यह एक बड़ी वजह रहा है। उल्लेखनीय है कि इसी वर्ष मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता सिर्फ इसलिए शामिल नहीं हुई थीं, क्योंकि उसमें श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे भी शामिल थे और उसी दौरान श्रीलंका की नौसेना ने कुछ तमिल मछुआरों को गिरफ्तार किया था।
हालांकि राजपक्षे ने सौजन्यता दिखाते हुए कुछ तमिल मछुआरों की रिहाई के आदेश दिए थे, मगर उनमें मादक पदार्थों की कथित तस्करी के आरोप में पकड़े गए मछुआरे शामिल नहीं थे। हालांकि यह भी सच है कि भारतीय सीमा में घुस आए श्रीलंका के मछुआरों को गिरफ्तार करने से भारतीय जवान भी गुरेज नहीं करते।
2011 के बाद से श्रीलंका ने जहां 600 से अधिक भारतीय मछुआरों को गिरफ्तार किया वहीं, भारत ने श्रीलंका के 450 मछुआरों को। मछुआरों की यह समस्या भारत और पाकिस्तान की सीमा खासतौर से गुजरात में भी देखी जा सकती है, जहां अक्सर दोनों देशों के मछुआरे एक दूसरे की सीमा में घुस आते हैं।
लेकिन तमिलनाडु का मामला इससे अलग है, जिसे दोनों देशों के बीच 1974 में हुए समझौते के बरक्स देखने की जरूरत है। उस समय भारत ने एक निर्जन द्वीप कच्चाथिवू पर श्रीलंका का स्वामित्व स्वीकार कर लिया था और दोनों देशों ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा को मान्यता दी थी।
लेकिन तमिलनाडु सरकार का कहना है कि यह समझौता ही गलत था, क्योंकि इस द्वीप पर ऐतिहासिक और कानूनी रूप से भारत का दावा बनता है। जाहिर है, मामला सौजन्यतावश होने वाली मछुआरों की अदला-बदली से आगे निकल गया है, जिसे स्थायी तौर पर सुलझाने की पहल होनी चाहिए।