शीत सत्र के पहले दिन लोकसभा में हुए गतिरोध को अगर पैमाना मानें, तो आशंका होती है कि यह पूरा सत्र भी राजनीतिक नूरा-कुश्ती, दांव-पेच और हंगामे में ही न खत्म हो जाए। इस सत्र में कई ऐसे महत्वपूर्ण विधेयक पेश होने हैं, जिनके जरिये भारी विदेशी निवेश और रोजगार सृजन के अलावा ई-गवर्नेंस को समुचित महत्व देने का लक्ष्य है। लेकिन खुदरा व्यापार में 51 फीसदी एफडीआई को मंजूरी देने के फैसले पर विपक्ष के विरोध का सामना करती सरकार के लिए सब कुछ इतना आसान नहीं है।
अरविंद केजरीवाल ने अब आतंकवादियों से लड़ने वाले एनएसजी कमांडो की हकीकत जिस तरह सामने रखी है, उससे तो सरकार को कसाब की फांसी का कोई राजनीतिक लाभ मिलता भी नहीं दिख रहा। तृणमूल कांग्रेस का अविश्वास प्रस्ताव पर्याप्त संख्याबल न होने के कारण भले खारिज हो गया, लेकिन एफडीआई पर नियम 184 के तहत बहस कराने के विपक्ष के दांव में, जिसमें वोटिंग का प्रावधान है, फंसने का जोखिम सरकार नहीं लेना चाहती।
सरसरी तौर पर देखें, तो मौजूदा गतिरोध के लिए वह कोई कम जिम्मेदार नहीं है। अगर सरकार ने राजनीतिक सहमति के बाद ही एफडीआई पर फैसला लेने का आश्वासन दिया था, तो इस दिशा में कदम उठाने से पहले उसे विपक्ष को भरोसे में लेना ही चाहिए था। वैसा तो उसने नहीं ही किया, उलटे अब वह तर्क दे रही है कि कार्यपालिका के नीतिगत निर्णय पर बहस में वोटिंग का औचित्य नहीं है। जबकि माकपा का जवाब है कि राजग के दौर में बाल्को में विनिवेश के मुद्दे पर संसद में हुई बहस में वोटिंग हुई थी।
जाहिर है, यह तर्क-वितर्क कहीं नहीं ले जाएगा। इसके बजाय सर्वसम्मति से संसद को चलने देने का कोई रास्ता अख्तियार करना ही बेहतर होगा। यह जिम्मेदारी जितनी सरकार की है, उतनी ही उस विपक्ष की भी, जो आक्रामक तो है, लेकिन बिखरा हुआ भी है। यहां तक कि इस मुद्दे पर राजग में भी एकजुटता नहीं है। मतदान के तहत बहस के लिए अड़ा विपक्ष यह क्यों नहीं सोचता कि संसद का मुख्य काम कानून बनाना है, और उसके लगातार असहयोग से यह उद्देश्य ही बाधित हो रहा है। ऐसे में, गतिरोध दूर करने का कोई सर्वसम्मत फॉरमूला जितनी जल्दी आए, उतना ही अच्छा होगा।