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प्यानो की धुन पर बॉलीवुड का मेलोड्रामा

Wed, 03 Feb 2016 04:47 PM IST
दिनेश श्रीनेत/अमर उजाला, नई दिल्ली
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फिल्मों से एक अहम किरदार इन दिनों गायब हो चला है। हालांकि उस किरदार के लिए किसी अभिनेता की जरूरत नहीं थी मगर वह इतना ही महत्वपूर्ण था जितना कि कोई अभिनेता। किरदार था प्यानो। इटैलियन संगीतकार बर्तोलोनियो ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि जिस आधुनिक प्यानो का वह अविष्कार कर रहा है, वो एशिया के किसी देश में इस कदर पॉपुलर होगा कि अक्सर वहां की फिल्मों में बजता हुआ दिखेगा। मुझे यकीन है कि वेस्ट की फिल्मों से ज्यादा प्यानो हमारी बॉलीवुड की फिल्मों में बजा होगा।
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रीयल लाइफ में तो प्यानो कम देखने को मिलता है मगर हिन्दी फिल्मों मे देख-देखकर हम उसकी हर बारीकी से परिचित हो गए हैं। उसके दो रंगो वाले की-बोर्ड से, उसकी लिड से और उस स्टिक से जिसके सहारे लिड टिकी दिखती है। पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों से लेकर एक-डेढ़ दशक पहले तक की फिल्मों में प्यानो का खास रोल होता था। इसके लिए सिचुएशन तय होती थी। बस एक पार्टी! उस पार्टी हॉल में एक प्यानो। एक गीत की फरमाइश और फिर धीरे-धीरे संगीत की धुन में रिश्तों के धागों का धीरे-धीरे खुलना या उलझना। हर चरित्र यहां पर अपने भीतरी डाइमेंशन के साथ जिस तरह सामने आता था, उसे बयान करने के लिए पटकथा लेखक को न जाने कितनी मगजमारी करनी पढ़ती फिर भी न तो बात बनती और न ही इतने खूबसूरत तरीके से कही जा सकती थी। देखें एक नजर-



उदास नोट्स
राज कपूर ने संगम में शायद प्यानो का सबसे बेहतरीन इस्तेमाल किया है। "हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना गाएगा..." गीत के फिल्मांकन में प्यानो न होता तो शायद ही राज कपूर तीनों किरदारों और उनके बीच आने वाली जटिलता को इतने बेहतर तरीके से प्रस्तुत कर पाते। आगे फिल्म में एक बार फिर प्यानो का इस्तेमाल होता है। "दोस्त-दोस्त ना रहा" गीत में एक बार फिर प्यानो है और वही तीनों किरदार हैं- राज कपूर, वैजयंतीमाला और राजेंद्र कुमार। इस बार हालात बदले हुए हैं और तीनों के फ्लैशबैक के साथ प्यानो की उदास धुन है।
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खाली घर और प्यानो
हिन्दी सिनेमा में प्यानो अक्सर नायिकाओं के विशाल बंगलों की शोभा बढ़ाया करते थे। बॉलीवुड की फिल्मों में नायकों के घर प्यानो मैंने कम ही देखा। अगर नायिकाएं किसी अमीर परिवार की पढ़ी-लिखी और हाई सोसाइटी में उठने-बैठने वाली हैं तो प्यानो का होना जरूरी है। उनके प्रेम का इजहार तो अक्सर प्यानो की मदद से हो जाता था। प्यानो का एक और बड़ा रोल होता था... तब जब नायिका की शादी हो चुकी हो। अगर आपने उसे प्यानो के साथ देखा तो इसका मतलब है कि उसकी जिंदगी में कहीं कोई खालीपन या अकेलापन है या कहानी में कोई ट्विस्ट आने वाला है।



दुख की दास्तान
ऐसा नहीं है कि प्यानो सिर्फ रूमानी भावों को दर्शाता था। इसने हमारे नायकों की तकलीफ और गुस्से को भी झलकाया है। धर्मेंद्र, राजेश खन्ना, राज कपूर, शम्मी कपूर के कॅरियर के कुछ यादगार दृश्य प्यानो के साथ ही हैं। जरा ब्रह्मचारी में शम्मी कपूर की प्यानो के साथ एनर्जेटिक परफार्मेंस देखिए। उन्होंने किरदार के भीतर उमड़ते रोष को प्यानो के साथ कैसे अभिव्यक्त किया है। और 'कटी पतंग' में राजेश खन्ना के सदाबहार गीत को कोई कैसे भूल सकता है। "प्यार दीवाना होता है..." गीत की पूरी सिचुएशन की अब तो प्यानो के बिना कल्पना ही नहीं की जा सकती।



कहानी में ट्विस्ट
और जिंदगी में उतार-चढ़ाव आए। हमारा नायक निराश हो। जिंदगी से हार चुका हो, टूट चुका हो तो? ...तो भी प्यानो हाजिर है। देखिए सुभाष घई ने 'मेरी जंग' में प्यानो का कितना ड्रामेटिक इस्तेमाल किया है।
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