पीजीआई में चिकित्सकों की हड़ताल चौथे दिन भी जारी रही। सोमवार को प्रबंधन के व्यवस्था बनाए रखने सारे दावे फेल हो गए। इलाज के अभाव में एक ही दिन में चार मरीजों की मौत पर जमकर हंगामा हुआ।
हालात इस कदर बेकाबू हो गए हैं कि अब डॉक्टर मरीजों को दाखिल करने से साफ इनकार करने लगे हैं। मरीज भी अब मायूस होकर पीजीआई से लौटने लगे हैं।
वीसी ने ओपीडी समेत सभी जगहों का दौरा किया। शाम को निदेशक डॉ. चांद सिंह ढुल विभाग प्रभारियों की बैठक ले व्यवस्था बनाने पर मंथन किया।
परजनों का आरोप, इलाज नहीं होने पर टूटी सांसें
केस नंबर-1: लावारिस छोड़ दिया मेरे पिता को
पुरानी सब्जी मंडी स्थित लक्ष्मी धर्मकांटा के सामने गली निवासी चांद राम (45 वर्ष) डीएलएफ कॉलोनी में काम करता था। उसका पहले से ही इलाज चल रहा था।
सोमवार सुबह सवा 10 बजे एकाएक हालत बिगड़ने पर परिजन उसे पीजीआई लेकर पहुंचे। चांद राम के बेटे रवींद्र और अश्विनी ने बताया कि ईसीजी करवाने के बाद उसे लावारिस छोड़ दिया गया।
किसी भी डॉक्टर ने नहीं संभाला। कोई बोला तीन नंबर में ले जाओ तो कोई 5 नंबर में ले जाने की बात कह रहा था। आरोप लगाया कि उनके पिता को चिकित्सकों ने नहीं संभाला, जिस कारण उनकी मौत हो गई। दोपहर डेढ़ बजे पिता के शव को लेकर परिजन घर लौट गए।
केस नंबर- 2: आज डॉक्टरों को असली रूप देख लिया
झज्जर जिले के गांव खरमाणा निवासी धनपति ने पीजीआई में दम तोड़ दिया। उसकी बेटी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि एक बार एक डॉक्टर ने चेक किया, लेकिन उसके बाद किसी ने देखना तक मुनासिब नहीं समझा। अगर डॉक्टर होते तो मेरी मां की मौत नहीं होती। उसकी मां को कैंसर था। वह सोमवार सुबह 9 बजे इमरजेंसी में पहुंची थी, लेकिन दोपहर 12 बजे तक कोई डॉक्टर ही नहीं था। लोगों से सुना है कि डॉक्टर भगवान का रूप होते हैं, लेकिन आज डाक्टरों का असली रूप सामने आया है। इन्हें किसी के दुख सुख से कोई सरोकार नहीं है।
केस नंबर- 3: लावारिस ने स्ट्रेचर पर ही तोड़ दिया दम
महम से रेफर होकर पहुंचे एक लावारिस मरीज ने भी चिकित्सकों की कमी में दम तोड़ दिया। बताया जा रहा है कि सुबह करीब 10 बजकर 5 मिनट पर एक मरीज महम सिविल अस्पताल में से रेफर होकर पीजीआई इमरजेंसी में पहुंचा। पीजीआई में लावारिस ने स्ट्रेचर पर ही दम तोड़ दिया। बाद में जनसेवा संस्थान के सेवाकर्ताओं ने शव को पोस्टमार्टम के लिए पीजीआई मोर्चरी भिजवा दिया।
केस नंबर-4: नर्स तो आई, लेकिन डॉक्टर नहीं
वार्ड 15 के रूम नंबर-3 में भी सोमवार सुबह साढ़े 6 बजे के आसपास एक बच्चे की मौत हो गई। बच्चे के परिजन तो नहीं मिले। लेकिन साथ में दाखिल अन्य बच्चों के परिजनों का कहना है कि बच्चा कल रात से ही काफी सीरियस था। कई बार संदेश भी दिया, लेकिन समय पर डॉक्टर नहीं आए। हालांकि नर्स तो रात में कई बार आई। समय पर डॉक्टर आते तो शायद उसकी जान बच जाती।
इसलिए खतरा ज्यादा: रात को भी नहीं संभली इमरजेंसी
पीजीआई सूत्रों के अनुसार देर रात हादसे में गंभीर रूप से घायल 6 लोगाें को पीजीआई लाया गया। यहां एक गंभीर की मौत हो गई। लेकिन एक साथ इतने घायलों के पहुंच जाने से इमरजेंसी में हालात अनियंत्रित हो गए। इसके बाद गंभीर रूप से घायल पांच मरीजों को शहर के एक निजी अस्पताल में दाखिल कराया गया। रात को भी हालात बेकाबू होना खतरे की घंटी है।
मरीजों ने भी मोड़ा पीजीआई से मुंह
चार दिन से हड़ताल के कारण मरीजों खासकर गंभीर मरीजों ने पीजीआई से मुंह मोड़ना शुरू कर दिया है। हाल ये है कि इमरजेंसी मरीज सीधे निजी अस्पतालों में जाने लगे हैं। कोई भूला भटका यहां पहुंच जाता है तो उसे डाक्टरों की कमी के चलते बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। पिछले चार दिनों में 500 से ज्यादा मरीज पीजीआई इमरजेंसी से बाहर निजी अस्पतालों की ओर रुख कर चुके हैं। मरीजों को महंगा इलाज करवाना पड़ रहा है।
नहीं हुए सीटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड
यहां सोमवार को न तो अल्ट्रासाउंड हुए और न ही सीटी स्कैन। बता दें कि पीजीआई में सीटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड करने की जिम्मेदारी सीनियर और जूनियर रेजीडेंट ही संभालते हैं। लेकिन उनके हड़ताल पर जाने के कारण सारी जिम्मेदारी सीनियर कंसलटेंट पर आ गई है। रोजाना 100 के आसपास सीटी स्कैन हो जाते हैं, जबकि अल्ट्रासाउंड की संख्या तो 500 से ज्यादा है। रेडियोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डा. रोहतास कुमार यादव का कहना है कि इमरजेंसी अल्ट्रासाउंड किए जा रहे हैं और सीटी स्कैन नहीं हो पाए हैं।
वर्जन
‘पीजीआई प्रबंधन की ओर से हमारे साथ कोई बातचीत नहीं की गई है। इससे लग रहा है कि प्रबंधन हमारी मांगों और सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं है। इसलिए सभी ने हड़ताल जारी रखने का फैसला लिया है।’
डा. वरुण गर्ग, अध्यक्ष, आरडीए।
‘अस्पताल में मरीजों को किसी तरह की दिक्कत न आए। इसलिए कॉलेज काउंसिल की आपात बैठक बुलाई गई है। विभागाध्यक्षों ने आश्वस्त किया है कि किसी भी मरीज को दिक्कत नहीं होेने दी जाएगी।’
डॉ. चांद सिंह ढुल, निदेशक, पीजीआईएमएस, रोहतक।