परवेज मुशर्रफ ने अपनी किताब इन द लाइन ऑफ फायर में लिखा था कि पाकिस्तान में यह अप्रत्याशित नहीं है कि आमजन और बुद्धिजीवी राजनीतिक व्यवस्था से तंग आकर सैन्य प्रमुख से देश को बचाने की गुहार लगाएं।
मगर बीते दो दिनों से पड़ोसी मुल्क में जो कुछ हो रहा है, उससे अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं कि यह पूर्व सैन्य प्रमुख बदलते वक्त को आंकने में कितना गलत साबित हुआ कि उसे आज कहीं भी शरण मिलती नहीं दिख रही है।
आज वह कानून के पंजों से चौतरफा घिर गए हैं और उनके पास बचने का कोई रास्ता नहीं है, तो कदाचित इसलिए कि वह यह अंदाजा नहीं लगा सके कि एक निहत्था जनरल किसी के काम का नहीं होता! न अपने मुल्क के और न ही अमेरिका के। लोकतांत्रिक सरकार का तख्तापलट कर सत्ता हथियाने वाले और फिर लोकतांत्रिक संस्थाओं और संविधान के साथ खिलवाड़ करने वाले मुशर्रफ लोकतंत्र के रास्ते से ही पाकिस्तान में नए सिरे से जमीन तलाशना चाहते थे।
मगर पिछले महीने जब उन्होंने निर्वासन खत्म कर अपने मुल्क में कदम रखा था, तभी साफ हो गया था कि पाकिस्तान के राजनीतिक परिदृश्य में उनके लिए जगह नहीं है। उन्हें वैसी तवज्जो नहीं मिली, जैसी राजनीतिक निर्वासितों को वहां मिलती रही है और बची-खुची कसर उनके नामांकन पत्रों के रद्द किए जाने से पूरी हो गई।
आखिर यह कोई कैसे भूल सकता है कि जब तक वह सत्ता में रहे, उन्होंने संसद से लेकर न्यायपालिका तक को अपने कब्जे में करने की कोशिश की थी। उन पर बेनजीर भुट्टो और नवाब अकबर बुग्ती की हत्या में संलिप्त होने के साथ ही जजों को नजरबंद करने के गंभीर आरोप लगे हैं, जिससे पाकिस्तान के पूरे तंत्र की बेबसी दिखाई देती है।
मगर इससे एक चिंता यह भी होती है कि कहीं वहां की न्यायपालिका अति सक्रियता तो नहीं दिखा रही? आखिर उसके दबाव में वहां एक प्रधानमंत्री तक को हटना पड़ा था। मुशर्रफ के साथ जो कुछ हो रहा है, उससे यह भी साफ है कि कभी उनके अधीन रही पाकिस्तानी फौज का उन्होंने विश्वास खो दिया है।
हालांकि सच यह भी है कि मुशर्रफ के प्रकरण से फौज के लिए भी एक संदेश गया है, क्योंकि इससे पहले किसी सैन्य तानाशाह को इस तरह अदालती कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ा था। इन सबके बीच, यदि पाकिस्तान में राजनीतिक ताकतें मजबूत होती हैं, तो इससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता।