जम्मू-कश्मीर में सेना, वायुसेना और एनडीआरएफ के जवान जान पर खेलकर भी पानी में घिरे हुए लोगों को जिस तरह सुरक्षित जगहों तक पहुंचा रहे हैं, वह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है। अब भी उसके जवान दिन-रात राहत कार्यों में लगे हैं, जबकि घाटी में राहत की बाट जोहते विवश सैनिकों और उनके परिवारों की संख्या भी हजारों में है।
इसके बावजूद बाढ़ का पानी उतरने के साथ स्थानीय लोगों का गुस्सा बढ़ा है, तो उसकी वजह है। दरअसल जम्मू-कश्मीर का यह हाल लंबे समय से पर्यावरण की अनदेखी का भी नतीजा है; इसके ब्योरे हैं कि नदियों में गाद भरने, वनों के कटने और झीलों के आसपास अंधाधुंध निर्माण से सूबे में भीषण जलप्लावन की चेतावनियां पहले ही जारी की जा चुकी थीं।
तिस पर जिस बाढ़ को सूबे में आजादी के बाद की सबसे भीषण बाढ़ बताया जा रहा है, उसमें राहत कार्यों को अंजाम देने में राज्य सरकार की लगभग गैरमौजूदगी तो और भी स्तब्ध करने वाली है। स्थानीय लोगों का कहना है कि राहत कार्यों में पर्यटकों और वीआईपी लोगों को तरजीह दी जा रही हैः बीते साल उत्तराखंड त्रासदी के समय भी ऐसे ही आरोप लगे थे।
जम्मू-कश्मीर भी उत्तराखंड की तरह चूंकि तीर्थ और पर्यटन स्थल है, ऐसे में आपदा के समय बाहरी लोगों को सुरक्षित जगहों तक पहुंचाने का दबाव तो रहता है, मुश्किल यह है कि स्थानीय लोगों को राहत पहुंचाने की जो जिम्मेदारी राज्य सरकार को अपने हाथ में लेनी चाहिए थी, उसमें वह पूरी तरह विफल रही है।
ठीक है कि यह कोई साधारण आपदा नहीं है, पर इतने दिन गुजर जाने पर भी बाढ़ में गायब हुए परिजनों के बारे में जानकारी देने के लिए कोई स्थानीय तंत्र काम नहीं कर रहा, तो यह हैरान करने वाला जरूर है। पानी के उतरते ही बीमारियों की आशंका जोर पकड़ रही है, पर बहुतेरे अस्पताल या तो खाली हैं या वहां डॉक्टर और नर्स नहीं हैं।
भोजन, पानी, दूध, दवा, यहां तक कि एक इलाके से दूसरे इलाके में जाने के लिए भी अगर लोग सेना पर निर्भर हों, तो यह कोई अच्छी स्थिति नहीं। दरअसल इस आपदा में कदम-कदम पर राज्य सरकार की बदइंतजामी के उदाहरण सामने आ रहे हैं। ऐसे में लोग क्षुब्ध न हों, तो क्या करें!
सूबे में बिजली और जलापूर्ति जल्दी ही पूरी तरह बहाल होने की उम्मीद के साथ सड़क मार्ग के जल्दी खुलने की भी जो संभावना बनी है, इससे यह आशा बंधती है कि आने वाले दिनों में राहत कार्य और रफ्तार पकड़ेगा।