प्रो सीएनआर राव राजनेता नहीं, वैज्ञानिक हैं, इसलिए वह राजनीतिक दांव-पेच नहीं जानते। भारत रत्न के लिए उनके नाम की घोषणा के कुछ घंटे बाद ही प्रो राव ने देश में वैज्ञानिक शोध के क्षेत्र में सरकारी बेरुखी की ओर ध्यान खींचते हुए राजनीतिकों को 'बेवकूफ' करार दिया था। हालांकि बाद में उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि अक्षरशः उनका आशय वैसा नहीं था, बल्कि वह वैज्ञानिक शोध की बदहाल स्थिति की ओर ध्यान दिलाना चाहते थे।
असल में उनके इस वक्तव्य को इसी रूप में देखने की जरूरत है, क्योंकि देश में वैज्ञानिक अनुसंधान और खोज की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। इसे राव की हताशा कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। पचास वर्षों से अधिक समय से सक्रिय प्रो राव ने पदार्थ के गुणों और आणविक संरचना के बीच बुनियादी समझ विकसित करने में अहम भूमिका निभाई है और उनके काम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है। दुनियाभर के पचास से अधिक विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद उपाधि से नवाजा है।
ऐसे में वह देश में विज्ञान की स्थिति पर कुछ कह रहे हैं, तो उस पर गौर करने की जरूरत है। निश्चय ही चंद्रयान से लेकर मंगल अभियान तक की हमारी वैज्ञानिक उपलब्धियां कमतर नहीं हैं, खुद प्रो राव ने भी इन उपलब्धियों को उल्लेखनीय बताया है। इसके बावजूद यह ध्यान में रखना चाहिए कि हमारे शीर्ष इंजीनियरिंग और विज्ञान संस्थान दुनिया के शीर्ष सौ संस्थानों में जगह नहीं बना पाते हैं।
वैज्ञानिक शोध के क्षेत्र में जिस तरह के निवेश की जरूरत है, उस ओर सरकारें ध्यान नहीं देतीं, क्योंकि यह उनकी प्राथमिकता में ही नहीं है। यह विडंबना है कि मनोरंजन जैसे क्षेत्र में पैसा लगाने वालों की कमी नहीं है, लेकिन विज्ञान जैसे लोककल्याणकारी क्षेत्र से सरकारें तक हाथ खींच लेती हैं। प्रो राव का मानना है कि यदि हमारे शीर्ष संस्थानों में अनुसंधान पर प्राथमिकता के आधार पर ध्यान दिया जाए, तो जो प्रतिभाएं एमआईटी या दूसरे प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालयों में चली जाती हैं, उन्हें भारत में ही रहने के लिए प्रेरित किया जा सकेगा। इसमें गलत क्या है? आखिर भारतीय प्रतिभाओं के बारे में जब तब ऐसी मिसाल दी ही जाती है। प्रो राव को भारत रत्न से नवाजे जाने का तभी मतलब निकलेगा, जब उनकी बातों की ओर राजनीतिक वर्ग ध्यान देगा।