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पचमढ़ी से जयपुर तक

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ऐसा लगता है कि कांग्रेस 1998 के पचमढ़ी चिंतन शिविर से काफी आगे निकल आई है, जब उसे गठबंधन की राजनीति से ही परहेज था। 2014 के लोकसभा चुनाव पर जयपुर में मंथन के लिए जुटी पार्टी में गठबंधन की राजनीति को लेकर किसी तरह का संशय नहीं है, अध्यक्ष सोनिया गांधी से लेकर पी चिदबंरम और जयराम रमेश तक ने इस हकीकत को स्वीकार किया है।
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और जब पार्टी यह स्वीकार कर रही है कि उसे नए साथियों से परहेज नहीं, तो इसका साफ मतलब यह भी है कि वह अपने बूते आगे नहीं बढ़ सकती। यह विडंबना ही है कि उसी पचमढ़ी शिविर में पार्टी ने खासतौर से उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में संगठन को मजबूत करने का संकल्प लिया था, मगर आज हालत यह है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे भाजपा शासित राज्यों में ही नहीं, आंध्र प्रदेश जैसे उसके गढ़ में भी उसका आधार खिसक गया है।

गुजरात में उसे विधानसभा चुनाव के लिए ढंग के उम्मीदवार तक नहीं मिले थे। सोनिया गांधी भले इस स्थिति के लिए पार्टी की गुटबाजी और नेताओं के टकराव को जिम्मेदार ठहरा लें; मगर नौ वर्ष से केंद्र की सत्ता पर काबिज पार्टी की एक हकीकत यह भी है कि कई अहम मौकों पर वह नेतृत्वहीन नजर आती है। इसका खामियाजा उसे राजनीतिक तौर पर उठाना पड़ा है, तो देश को आर्थिक रूप से, क्योंकि इसी वजह से महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले या तो देर से लिए गए या टाल दिए गए।
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असल में पार्टी की असली चुनौती यही है कि वह अगले आम चुनाव में ही नहीं, बल्कि कुछ महीनों के दौरान होने वाले विधानसभा चुनावों में भी किसके नेतृत्व में उतरती है। पार्टी ने हालांकि राहुल गांधी को चुनाव समिति का प्रमुख नियुक्त किया है, मगर गुजरात विधानसभा चुनाव में पार्टी को मिली पराजय के बाद से सार्वजनिक रूप से उनकी उपस्थिति दर्ज नहीं की गई है।

वह तब भी नजर नहीं आए, जब दिल्ली में 23 वर्षीय पैरा मेडिकल छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना पर सारा देश उबल पड़ा और दिल्ली की सड़कों पर युवा उतर आए थे। इस घटना के बाद महिलाओं की सुरक्षा पार्टी के एजेंडे पर निश्चय ही सबसे ऊपर है, लेकिन विधायिका में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण संबंधी विधेयक वह पास नहीं करवा सकी है। यदि पार्टी को वाकई अपना खोया हुआ आधार चाहिए, तो उसे जमीनी स्तर पर ठोस कार्यक्रमों के साथ आगे बढ़ना होगा।  
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