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एक इस्तीफा, कई सवाल

Fri, 30 Jan 2015 08:43 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
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राजनीति में निष्ठा का त्याग नया नहीं, खासकर तब, जब सत्ता में जल्दी लौटने की उम्मीद न हो। इसके बावजूद जयंती नटराजन का कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा सनसनीखेज इसलिए है, क्योंकि उन्होंने पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पर सवाल यह है कि ये आरोप इतनी देरी से क्यों। पर्यावरण मंत्री, फिर प्रवक्ता पद से हटाए जाने से वह इतनी ही आहत थीं, तो अब तक चुप क्यों थीं?
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विद्रूप यह कि राहुल गांधी को खलनायक, और खुद को शिकार बताने के बावजूद उनके खुलासे पर भरोसा कम ही होता है। यही नहीं कि कांग्रेस ने उनके भ्रष्टाचरण की ओर इशारा किया है, यह भी सामने आया है कि वह मंत्रालय की फाइलें चेन्नई ले जाती थीं! यूपीए के कार्यकाल में पर्यावरण मंत्रालय में हुई कथित अनियमितताओं की सीबीआई जांच की चर्चा है। खुद को 'शहीद' बताते हुए पार्टी छोड़ने के पीछे क्या जांच का भय ही है? नहीं तो जिन नटराजन के कामकाज पर तंज कसते हुए नरेंद्र मोदी ने 'जयंती टैक्स' का जुमला गढ़ा था, वही नटराजन आज क्यों कह रही हैं कि कांग्रेस ने स्नूपगेट मामले में मोदी की आलोचना के लिए उन पर दबाव डाला था?

इसीलिए संदेह होता है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़ने का फैसला खुद उनका है, या भाजपा के दबाव का नतीजा। इसके ब्योरे हैं कि पिछले दिनों नटराजन ने भाजपा अध्यक्ष से मुलाकात की थी। पर जयंती का इस्तीफा भी कांग्रेस के जिम्मेदार चेहरों को कठघरे में ही खड़ा करता है। उन्होंने राहुल गांधी के दोहरेपन की पोल खोली है कि नियमगिरि में आदिवासियों का सिपाही बताने वाला फिक्की की बैठक में किस तरह उद्योगपतियों के हितों का रखवाला बन गया! जवाब देने के लिए न सिर्फ राहुल गांधी को सामने आना चाहिए, बल्कि मनमोहन सिंह को भी बताना चाहिए कि नटराजन के खिलाफ शिकायतें मंत्रालय से उनकी विदाई की वजह बनीं या कांग्रेस अध्यक्ष के इशारे पर उन्होंने उनका इस्तीफा ले लिया। जिस तमिलनाडु में जीके वासन के पार्टी छोड़ने के बाद कार्ति चिदंबरम ने आलाकमान को चुनौती दी है, मौजूदा घटनाक्रम उस राज्य में कांग्रेस के लिए बड़ा झटका तो खैर है ही।
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