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उम्मीद भरे सफर पर

Tue, 31 Dec 2013 08:04 PM IST
नई दिल्ली
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आज से शुरू हुआ नया वर्ष एक कैलेंडर के पुराने पड़ जाने भर से नया नहीं है, बल्कि उन उम्मीदों के कारण भी नया है, जो पिछले साल हासिल उपलब्धियों से पैदा हुई हैं। कंपकंपाती ठंड में सूरज बेशक साफ नजर नहीं आता, पर विगत एक साल में राजनीति से लेकर समाज तक में आया बदलाव हमें प्रेरणा भी दे रहा है और ऊर्जा भी।
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आम आदमी पार्टी के आने से पहले भी इस देश में बड़े राजनीतिक बदलाव हुए हैं, लेकिन जड़ व्यवस्था के खिलाफ आम आदमी का आक्रोश इतने प्रभावी ढंग से इससे पहले शायद ही दिखा हो। विधानसभा चुनावों में ज्यादातर जगह भारी संख्या में मतदान इस जागरूकता का ही नतीजा है। न्यायपालिका तो पहले से ही न्याय दिलाने में आगे रही है, सीबीआई और कैग जैसी संस्थाएं भी पारदर्शिता की लड़ाई में अब पीछे नहीं हैं।

भारी जनदबाव के कारण ही संसद को पिछले साल अपराध कानून संशोधन, खाद्य सुरक्षा, भूमि अधिग्रहण, पेंशन और लोकपाल जैसे विधेयक पारित करने पड़े। जो लोग 2012 में निर्भया के हक की लड़ाई को सड़कों पर ले आए थे, विगत वर्ष उन्हीं में से बहुतों को धारा 377 पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरोध में गली-कूचों में देखा गया। जो स्थापित राजनीतिक पार्टियां पहले कहती थीं कि भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं रहा, अब वही दल अपने विवादास्पद फैसले पलटते दिखाई देते हैं।
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लेकिन बहुत कुछ बदलना अभी शेष है। मसलन, सांप्रदायिक दंगे अब भी न सिर्फ कड़वी हकीकत हैं, बल्कि इन दंगों का लाभ उठाने की राजनीति भी उतनी ही सक्रिय है। इसी तरह औरतों के हक में उठती आवाजों के बीच शामली से लुधियाना तक लड़कियां तेजाबी हमले की जद में हैं। युवाओं की बढ़ती संख्या और शक्ति के बावजूद देश में उच्च शिक्षा की स्थिति ठीक नहीं, भोजन का अधिकार कानून के बावजूद कुपोषितों की संख्या बढ़ रही है, और मानव विकास की दिशा में तो ढंग की पहलकदमी तक नहीं की गई है।

चूंकि इस वर्ष लोकसभा के चुनाव हैं, इसलिए केंद्र की सत्ता में एक ऐसी सरकार की अपेक्षा सबसे अधिक है, जो अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए तत्परता से कदम उठाए और जिसकी विदेश नीति महाशिक्त देश की बंधक होने के बजाय पड़ोसी देशों को साथ लेकर चलने की हो। कामना यही है कि वर्ष 2014 केवल 2013 की औपचारिक विदाई न हो, वरन सही अर्थों में बेहतर बदलाव का वाहक बने।
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