आर्थिक तंगहाली, बेकाबू बेरोजगारी, गले की हड्डी बनता अफ-पाक, और सीरिया तथा ईरान में बढ़ती मुश्किलों के बावजूद बराक ओबामा दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए हैं, तो इसके गहरे अर्थ हैं। चार वर्ष पहले जब अमेरिकी मतदाताओं ने इस एफ्रो-अमेरिकी मूल के डेमोक्रेट को अपना राष्ट्रपति चुना था, तो उसे इराक और अफगानिस्तान में फौज के बेकाबू खर्चे से बिगड़ते देश के बजट और ग्वांतनामो जेल की यातनाओं से बढ़ती फजीहत की वजह से आलोचना झेल रहे रिपब्लिकन जॉर्ज बुश की नीतियों की नाकामी से कहीं अधिक; अमेरिकी समाज की बहुलातवादी नीतियों के रूप में प्रचारित किया गया था।
काफी हद तक यह बात सच भी थी, और खुद बराक ओबामा ने अपने पहले भाषण में अपनी जीत को मार्टिन लूथर किंग के शुरू किए संघर्ष से जोड़ा था। दरअसल यूरोपीय और अमेरिकी लोकतंत्र में यही नस्लीय उदारता सबसे बड़ा फर्क भी है। मगर इस बार उन्हें मिला समर्थन सिर्फ भावनाओं की जीत नहीं है। कहीं न कहीं इसमें अमेरिका के वर्चस्व को चुनौती देने वाले ओसामा बिन लादेन से मिली मुक्ति और अरब दुनिया में लोकतंत्र की मुहिम में अमेरिकी समर्थन का भी हिस्सा है। यह स्वीकार करना पड़ेगा कि 2008 की मंदी के बावजूद ओबामा अमेरिकी जनता को देश की आर्थिक स्थिति को पटरी पर लाने का भरोसा दे पाए।
ऐसा लगता है कि रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी बदलते अमेरिका की नब्ज नहीं पकड़ पाए, जहां भारत की तरह अमीर वर्ग अब निशाने पर है। जहां तक भारत की बात है, तो ओबामा की जीत से दोनों देशों के रिश्तों में कोई बड़ा फर्क नहीं आने वाला, बावजूद इसके कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान आउटसोर्सिंग का मुद्दा जोरशोर से उठाया था। उनकी नीतियों से निश्चित रूप से भारत के आईटी उद्योग को झटका लगा है, लेकिन द्विपक्षीय संबंधों की यह एक कड़ी है। भारत को यह देखना चाहिए कि वह अमेरिका का तीसरा बड़ा व्यापारिक साझेदार है। बहुत संभव है कि अब आने वाले दिनों में भारत पर एफडीआई को लेकर अमेरिकी लॉबी सक्रिय हो जाए। दूसरी ओर, बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत को तरजीह देना अमेरिका की जरूरत है, इसलिए ओबामा प्रशासन व्यापारिक और सामरिक, दोनों ही रूपों में अपने इस साथी के साथ संतुलन बनाकर चलेगा।