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अब नतीजों का इंतजार

Mon, 12 May 2014 07:58 PM IST
नई दिल्ली
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भीषण गर्मी के बीच आम चुनाव के आखिरी दौर के मतदान में भी लोगों ने जिस तरह का उत्साह दिखाया है, उसी का नतीजा है कि इस बार रिकॉर्ड मतदान दर्ज किया गया, जिसे हमारे लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत कहा जा सकता है। अधिक मतदान होने के पीछे युवा मतदाताओं की बढ़ती संख्या और सोशल मीडिया के विस्तार के साथ ही चुनाव आयोग के अपने प्रयास भी रहे हैं।
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मगर इतनी लंबी चुनावी प्रक्रिया के ही कारण आखिरी दौर के आते-आते नेता और कार्यकर्ता तक पस्त हो गए और आम लोग भी ऊबने से लगे थे! निश्चय ही इतने बड़े देश में आम चुनाव कराना एक बड़ी चुनौती है, मगर चुनाव आयोग को क्या इस पर विचार नहीं करना चाहिए कि कुछ कम चरणों में भी मतदान प्रक्रिया समेटी जा सकती थी। लंबे दौर के कारण ही नेताओं और राजनीतिक पार्टियों को आदर्श आचार संहिता को दरकिनार करने का मौका मिल गया।

वास्तविक आंकड़े तो शायद कभी बाहर न आएं, लेकिन यह चुनाव अब तक के सबसे खर्चीले चुनाव भी साबित हुए हैं, जिस पर चुनाव आयोग को नकेल कसने की जरूरत थी। बेशक, चुनावी हिंसा पहले से काफी कम हुई है, पर चुनावों के दौरान छत्तीसगढ़ और झारखंड में हुए माओवादियों के हमले बताते हैं कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सामने कैसी चुनौतियां हैं। इसके साथ ही यह चिंता की बात है कि विकास और जनहित से जुड़े मुद्दों के बजाय राजनीतिक विमर्श में व्यक्तिगत आक्षेप हावी होते चले गए।
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वास्तव में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के प्रबंधकों ने इस चुनाव को अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तरह बदल दिया, जिसका असर देश की भावी राजनीति में दिखेगा। चुनाव के नतीजे तो 16 मई को आएंगे, मगर दस वर्ष तक सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस के कई दिग्गजों ने मैदान छोड़कर पार्टी की हताशा की ओर ही इशारा किया।

कई चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों और अब एक्जिट पोल में दिखाया जा रहा है कि कांग्रेस दो अंकों में सिमट जाएगी, यदि ऐसा हुआ, तो सवा सौ वर्ष पुरानी पार्टी के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती होगी, जिसका असर उसके नेतृत्व यानी सोनिया-राहुल गांधी के वर्चस्व पर भी पड़ेगा। और यदि वाकई नरेंद्र मोदी एनडीए की सरकार बनाने में सफल होते हैं, तो उन्हें समावेशी राजनीति का परिचय देना होगा।
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