उत्तर प्रदेश के कांठ में लगी सांप्रदायिक हिंसा की आग अभी पूरी तरह बुझी भी नहीं थी कि सहारनपुर में ठीक ऐसी ही भीषण घटना का होना बेहद चिंतित करने वाला है। जिस धार्मिक स्थल पर निर्माण कार्य शुरू करने के विरोध में हिंसा भड़की, वह विवाद पुराना है। इसके बावजूद न राज्य सरकार ने इसे समुचित गंभीरता से लिया था, न ही आपात स्थिति से निपटने के लिए पुलिस-प्रशासन की कोई तैयारी थी।
मुजफ्फरनगर और कांठ की घटनाओं के सिलसिले में देखें, तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश को सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलसाने की साजिश सुनियोजित हो सकती है, ताकि ध्रुवीकरण का राजनीतिक लाभ उठाया जा सके। खासकर कांठ की घटना पर राजनीतिक दल अब भी जिस रवैये का परिचय दे रहे हैं, वह इसका ज्वलंत उदाहरण है। लेकिन अब तक किसी भी मोर्चे पर सुशासन का सुबूत न दे सकने वाली राज्य सरकार सांप्रदायिक हिंसा की हर घटना को जिस तरह किसी दूसरे की राजनीतिक साजिश करार देती है, वह सबसे ज्यादा खुद उसकी लाचारी का ही सुबूत है। राज्य में शांति बनाए रखना किसी और की जिम्मेदारी भला कैसे है?
सूबे के जिन सात विधानसभा क्षेत्रों में आने वाले दिनों में उपचुनाव होने हैं, उसमें सहारनपुर सिटी भी है। ऐसे में, सरकार और प्रशासन की यह खास जिम्मेदारी बनती थी कि वे बिल्कुल शुरू से नजर रखें कि यहां अमन-चैन को कोई खतरा न हो। लेकिन पहले से व्यवस्था करना तो दूर, शुरुआत में उपद्रवियों की संख्या और हिंसा की भीषणता के बारे में भी प्रशासन को कोई अंदाजा नहीं था। इसके ब्योरे हैं कि हिंसा भड़कने के बाद सहारनपुर के कई इलाकों में किस तरह अराजकता फैल गई, जिसमें अफवाहों का भी उतना ही हाथ था। बाद में बेशक चौतरफा सक्रियता से हिंसा पर काबू पाने में मदद मिली; केंद्र सरकार ने भी इसमें जरूरी तत्परता दिखाई, लेकिन जो नुकसान होना था, वह हो चुका है।
सहारनपुर की हिंसा का सबसे खतरनाक पक्ष यह है कि दो समुदायों के बीच शुरू हुई हिंसा की आंच तीसरे पक्ष तक फैल चुकी है। ऐसे में, स्थिति को पूरी तरह नियंत्रण में लाने के लिए अखिलेश सरकार को कुछ ज्यादा ही सक्रियता और समझदारी दिखाने की जरूरत पड़ेगी। दूसरी राजनीतिक पार्टियों को भी चाहिए कि वे ऐसे नाजुक मामलों में समुचित संवेदनशीलता का परिचय दें।