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कानून सबसे ऊपर

Sun, 01 Sep 2013 08:47 PM IST
नई दिल्ली
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आसाराम बापू अगर खुद को कानून और अदालत से ऊपर समझ रहे थे, तो गिरफ्तारी के बाद उनका यह भ्रम टूट गया होगा। आश्रम में सेवकों के बीच आराम की जिंदगी जी रहे इस कथावाचक को आज पुलिस हिरासत में तीखे सवालों का सामना करना पड़ रहा है, तो इसके लिए वह किसी और को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते।
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हमारा समाज साधुओं और धर्मगुरुओं को सम्मान देता है, तो उनसे आचरण की शुद्धता और नैतिकता की उम्मीद भी करता है। हमारे यहां ऐसे संतों की लंबी परंपरा रही है, जिन्होंने भटके हुए लोगों को रास्ता दिखाया है। अब भी ऐसे लोग कम नहीं होंगे। ऐसे में किसी धर्मगुरु का गलत आचरण समाज के लिए क्षोभ का ही नहीं, चिंता का विषय भी होना चाहिए। जिन साधु-संतों पर समाज को सही रास्ते पर ले जाने की जिम्मेदारी है, अगर उन्हीं पर गलत रास्ते पर चलने का आरोप लगता है, तो इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी!

पिछले दिनों एक नाबालिग के यौन उत्पीड़न के मामले में आसाराम बापू पर जब उंगली उठी, तब उन्हें खुद सामने आकर इस संबंध में अपनी दलीलें रखनी चाहिए थीं। इसलिए भी कि जिस लड़की ने आरोप लगाया, वह उन्हीं के आश्रम से जुड़ी थी। इसके बजाय उन्होंने सत्ता पर दबाव डालने का रास्ता चुना, जो न सिर्फ अनुचित था, बल्कि एक धर्मगुरु से इसकी उम्मीद भी नहीं कर सकते! संतों के ऐसे आचरण से उनके प्रति भक्तों की आस्था ही डिगती है।
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उन्हें अपनी बात कहने का मौका दिया गया, लेकिन उन्होंने उसे तवज्जो नहीं दी। उनके आश्रम के दरवाजे पर पुलिस पहुंची, तो कहा गया कि उनकी तबीयत खराब है। जबकि बाद में मेडिकल रिपोर्ट में उन्हें स्वस्थ पाया गया। आसाराम बापू लगातार यही कह रहे हैं कि कोई उनके खिलाफ साजिश कर रहा है। लेकिन वह यह नहीं बता पा रहे कि षड्यंत्र रचने भर से किसी की गिरफ्तारी कैसे संभव है!

जब से उनके खिलाफ यह मामला आया है, ठीक तभी से वह और उनके समर्थक पत्रकारों को निशाना बना रहे हैं। उनकी गिरफ्तारी के दौरान भी पत्रकारों पर हमला किया गया। प्रेम और शांति का उपदेश देने वाले धर्मगुरुओं को इतना उग्र क्यों होना चाहिए? उनके समर्थकों का क्षोभ अपनी जगह है, पर हिंसा उसका जवाब नहीं है।
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