बदहाल अर्थव्यवस्था, गहराता ऊर्जा संकट, बढ़ती बेरोजगारी, बेकाबू जातीय हिंसा और ड्रोन हमलों के कारण अमेरिका से बढ़ती तल्खी के बीच नवाज शरीफ ने नए प्रधानमंत्री के रूप में पाकिस्तान की कमान संभाली है।
इन सबके बावजूद एक लोकतांत्रिक सरकार के रूप में सत्ता का हस्तांतरण न केवल पाकिस्तान के लिए, बल्कि दक्षिण एशियाई क्षेत्र में स्थिरता के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।
वह करीब चौदह बरस बाद पाकिस्तान की सत्ता में लौटे हैं, लेकिन तबसे लेकर आज तक न केवल 9/11 के आतंकी हमले के बाद वैश्विक राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है, बल्कि उनका अपना देश आर्थिक बदहाली और आतंकवाद के दोतरफा मोर्चे पर लड़ रहा है।
लाख टके का सवाल है कि क्या उनकी वापसी से पाकिस्तान की अंदरूनी व्यवस्था और सोच में कोई तब्दीली आएगी? इस सवाल का सकारात्मक जवाब तलाशना फिलहाल वाकई बहुत मुश्किल है।
इसके बावजूद नवाज शरीफ ने जिस तरह से शपथ ग्रहण करने के बाद देश की आर्थिक बदहाली पर चिंता जताई, उससे उनकी प्राथमिकता का पता चलता है।
मुश्किल यह है कि देश का अंदरूनी ढांचा जर्जर होता जा रहा है, जिसे अभूतपूर्व बिजली संकट ने और गहरा दिया है। भूलना नहीं चाहिए कि पूरे चुनाव प्रचार के दौरान बिजली संकट एक बड़ा मसला था।
दूसरी ओर ड्रोन हमलों से परेशान तालिबान जैसी ताकतें भी शरीफ से उम्मीद लगाए बैठी हैं कि वह अमेरिका के प्रति कड़ा रुख अख्तियार करें।
शरीफ के लिए यह दोधारी तलवार पर चलने वाली स्थिति है। अच्छी बात यह है कि शरीफ ने भारत के साथ रिश्तों को लेकर उत्साह दिखाया है, हालांकि कश्मीर को लेकर उनका रुख पाकिस्तान के पारंपरिक रुख से अलग नहीं कहा जा सकता।
मगर यदि वह अभी कह रहे हैं कि भारत के साथ रिश्तों की डोर को वहां से पकड़ना चाहते हैं, जहां वह 1999 में छूट गई थी, तो उन पर भरोसा करना चाहिए।
लेकिन दोनों देशों के रिश्तों में तब्दीली तभी आ सकती है, जब पाकिस्तान आतंकवाद के मसले पर अपना रुख साफ करे और द्विपक्षीय व्यापार पर भेदभाव वाला रवैया छोड़े।
मगर स्थिति यह है कि शरीफ के शपथ ग्रहण करने के 48 घंटे भी नहीं बीते कि पाकिस्तान की ओर से सीमा पर भड़काने वाली कार्रवाई की गई, जिसमें एक भारतीय फौजी शहीद हो गया। इस तरह तो दोनों देशों के रिश्ते सामान्य नहीं, बल्कि और तल्ख ही होंगे।