फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जड़ता तोड़ेगा नया कानून

विज्ञापन
विज्ञापन
नए साल के पहले दिन देश को नए भूमि अधिग्रहण कानून का तोहफा मिला है, जिसने 120 साल पुराने कानून की जगह ले ली है।
विज्ञापन


'भूमि अर्जन, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम 2013' नामक इस जटिल से लगने वाले कानून को पिछले वर्ष सितंबर में पारित किया गया था। मगर जैसा कि इसके नाम में ही निहित है, इसमें न केवल भूस्वामियों, बल्कि उनकी जमीन पर आश्रित लोगों के हितों को भी ध्यान में रखा गया है। इसमें भू स्वामियों को मुआवजे और उनके पुनर्वास का तो प्रावधान है ही, उनकी जमीन पर आश्रित लोगों के पुनर्स्थापन और मुआवजे की भी व्यवस्था की गई है।

असल में औद्योगीकरण, आधारभूत संरचना के विकास और बढ़ते शहरीकरण की वजह से जमीनों का अधिग्रहण एक बड़ी चुनौती बन गया है। अंग्रेजों के समय के पुराने कानून में इतनी विसंगतियां थीं कि करोड़ों लोगों के समक्ष अस्तित्व का संकट पैदा हो गया। यही नहीं, उसने सरकारों को असीमित अधिकार भी दे रखे थे, जिसके जरिये वे मनमाने तरीके से जमीन का अधिग्रहण कर लेती थीं।
विज्ञापन


हालत यह थी कि कई परियोजनाओं के लिए अधिगृहीत जमीनों पर बरसों तक कोई काम ही नहीं हुआ! तो कई जगह ऐसी जमीनें, भूमि उपयोग बदलकर बिल्डरों के हवाले कर दी गईं। मगर नए कानून में भूमि अधिग्रहण के फैसले में स्थानीय निकायों और ग्राम सभाओं के साथ ही प्रभावित होने वाले लोगों की सहमति भी जरूरी होगी। बेशक इसकी वजह से परियोजनाओं की लागत तीन से पांच फीसदी तक बढ़ सकती है; मगर ऐसा सौदा कहीं अधिक टिकाऊ होगा और विवाद की आशंकाएं भी कम होंगी।
विज्ञापन


निश्चय ही, वन अधिकार कानून के बाद यह एक महत्वपूर्ण कानून है, मगर इसकी सार्थकता तभी होगी, जब दूरस्थ इलाकों में भी आधारभूत संरचनाओं के साथ ही औद्योगिक विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाए। ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश को तो भरोसा है कि यदि इसे अतिवादी वामपंथियों से प्रभावित इलाकों में उसकी मूल भावना के साथ लागू किया जाए, तो माओवादी कमजोर पड़ जाएंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि बीते दो वर्षों से देश जिस नीतिगत जड़ता में डूबा हुआ है, उसे तोड़ने में यह नया कानून मददगार साबित होगा।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें