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जिद छोड़ने की जरूरत

Fri, 01 May 2015 08:35 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
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उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के मुद्दे पर कार्यपालिका और न्यायपालिका को एक-दूसरे से असहमत होते देखना चिंताजनक है। एक तरफ सरकार है, जो करीब दो दशक पुरानी कॉलेजियम प्रणाली की जगह राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) को लागू कर चुकी है, दूसरी तरफ सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश हैं, जिन्होंने एनजेएसी का हिस्सा बनने से तब तक के लिए इन्कार कर दिया है, जब तक सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ सांविधानिक स्थिति साफ न कर दे।
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बेशक सरकार ने टकराव के रास्ते पर न जाने की बात कही है, पर उसके रवैये से लगता नहीं है कि वह यहां से पीछे मुड़ने को तैयार है। भले ही कॉलेजियम प्रणाली पर न्यायपालिका के भीतर उंगली उठ चुकी है कि यह अपारदर्शी प्रणाली है, इसमें न्यायाधीशों की नियुक्ति की कसौटियों का पता नहीं चलता, और इसके तहत कई अच्छे न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय में नहीं पहुंच पाए। पर उसकी जगह नई व्यवस्था बनाते हुए सर्वसहमति बनाने और न्यायिक स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखने की कोशिश की जानी चाहिए थी। संविधान पीठ ने ठीक उदाहरण दिया कि बेटी का वर चुनने की प्रक्रिया में कभी दामाद अगर गलत निकल जाए, तो उसके लिए पिता दोषी नहीं होता। उसने सरकार से पूछा भी है कि कॉलेजियम सिस्टम में क्या कभी न्यायपालिका द्वारा सुझाए गए नामों को खारिज करने की नौबत आई है?

कार्यपालिका को इस पर आपत्ति है कि जजों की नियुक्ति जज ही क्यों करें। पर कॉलेजियम प्रणाली में भी कार्यपालिका की सहभागिता थी, हां, न्यायिक स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखा गया था, जिसका नई व्यवस्था में उल्लंघन होने की आशंका गलत नहीं है। यही नहीं कि इसमें प्रधान न्यायाधीश की सर्वोच्चता नहीं रहेगी, बल्कि चयन प्रक्रिया में कानून मंत्री को शामिल करने से नियुक्ति का राजनीतिकरण होगा, जिस ओर राम जेठमलानी ने इंगित किया है। न्यायपालिका के राजनीतिकरण का क्या नुकसान होता है, यह हम आपातकाल के समय देख चुके हैं। यह हठधर्मिता जारी रही, तो लंबित मुकदमों के बोझ से परेशान न्यायपालिका के सामने नई नियुक्तियों का भी संकट होगा।
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