ली केचियांग ने प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी पहली विदेश यात्रा के तौर पर भारत को चुनकर और इस देश से जुड़ी अपनी स्मृतियों को साझा करते हुए खुद की ऐसी सम्मोहक छवि पेश करने की कोशिश की है, जो थोड़ी अप्रत्याशित है।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ बातचीत में भी उन्होंने टिप्पणी की कि चीन ऐसा कुछ नहीं करेगा, जिससे दोनों देशों के बीच दरार पैदा हो। लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल भिन्न है। सिर्फ यही नहीं कि ली केचियांग की भारत यात्रा से कुछ दिन पहले चीनी सैनिकों ने वास्तविक नियंत्रण सीमा रेखा का उल्लंघन कर भारतीय सीमा के भीतर अपने तंबू गाड़े थे, बल्कि चीनी प्रधानमंत्री के इस दौरे में भी जो 'समझौते' हुए हैं, उनका दोतरफा रिश्तों को मजबूती देने की दिशा में बहुत महत्व शायद ही हो।
चाहे वह वास्तविक नियंत्रण रेखा पर यथास्थिति बनाए रखने की बात हो या सीमा विवाद पर बातचीत हो या ब्रह्मपुत्र पर चीनी निर्माण की भारत को सूचना देने का आश्वासन-ये सिर्फ शब्दों की जुगाली हैं। वास्तविक नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ बंकरों का निर्माण हुआ है, लेकिन बीजिंग भारत पर अपने निर्मार्णों को नष्ट करने का दबाव बनाता है, उस पर यह नियम आयद नहीं होता।
सीमा विवाद पर न सिर्फ बातचीत निर्णायक मोड़ पर नहीं पहुंची है, बल्कि चीन जब-तब हमारे इलाकों को अपना बताता है। पिछले ब्रिक्स सम्मेलन में मनमोहन सिंह के उस सुझाव को बीजिंग ने खारिज कर दिया, जिसमें ब्रह्मपुत्र पर जानकारी साझा करने के लिए एक नई व्यवस्था बनाने की बात कही गई थी।
जहां तक आर्थिक रिश्ते की बात है, तो हमारे बाजार में चीन लगातार घुस रहा है, लेकिन उसके बाजार में हमारे घुसने की संभावनाएं अब भी क्षीण हैं। ऐसे में शालीन और आशावादी होने से काम नहीं चलने वाला। चीन को उसी के तेवर में जवाब देना होगा।
सीमा पर चीनी उद्दंडता का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तो हमें तैयार होना ही होगा, बीजिंग को यह भी साफ-साफ बता देना चाहिए कि हम अपने देश को अस्थिर करने की उसकी नीतियों को बर्दाश्त नहीं कर सकते। अभी तो यह देखना बाकी है कि यहां से पाकिस्तान जाकर ली केचियांग किस तरह रंग बदलते हैं।