यदि नरेंद्र मोदी के रूप में देश को गुजरात से दूसरा प्रधानमंत्री मिल रहा है, तो उनकी जगह उनके प्रदेश को आनंदीबेन पटेल के रूप में पहली महिला मुख्यमंत्री मिली हैं। अक्तूबर, 2001 में जब मोदी ने मुख्यमंत्री का पद संभाला था, तब से लेकर इन साढ़े बारह वर्षों में राज्य के हालात काफी बदल चुके हैं।
केशूभाई पटेल की जगह मुख्यमंत्री बने मोदी को भुज में आए भीषण भूकंप से बदहाल गुजरात मिला था। मगर उन्होंने न केवल प्रदेश को मजबूत नेतृत्व दिया, बल्कि उसे आर्थिक-सामाजिक पैमाने पर अग्रिम पंक्ति के राज्यों में ला खड़ा किया। बेशक, 2002 के दंगों के कारण उनकी छवि को धक्का लगा, लेकिन पिछले तीन विधानसभा चुनावों और अभी हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिली जीत ने यही साबित किया कि गुजरात के लोग उनके साथ हैं। गुजरातियों की उद्यमशीलता दुनिया भर में मशहूर है, पर मोदी ने जिस तरह के साहसिक फैसले किए, उसके कारण यह राज्य विकास का ऐसा मॉडल बन गया, जिसका लोहा अब सब मान रहे हैं।
ऐसे में जाहिर है, गांधीनगर से दिल्ली का रुख कर रहे मोदी की जगह ऐसे शख्स की जरूरत थी, जो उनके काम को आगे बढ़ा सके। मोदी मंत्रिमंडल में राजस्व, शहरी विकास एवं आपदा प्रबंधन मंत्री आनंदीबेन पटेल ऐसी ही कद्दावर शख्सियत की नेता मानी जाती हैं। मगर मोदी की छवि के कारण गुजरात के लोगों को उनसे अपेक्षाएं भी काफी होंगी और देश भर के लोगों की नजरें भी उनकी सरकार पर बनी रहेंगी।
उन्हें विरासत में एक ऐसा राज्य मिल रहा है, पिछले दस वर्षों के दौरान जिसकी औसत विकास दर 10.1 फीसदी रही है, जबकि इस अवधि में राष्ट्रीय औसत 7.7 फीसदी रहा। यही नहीं, मोदी की पहल से शुरू हुई वाइब्रेंट गुजरात समिट और 'सिंगल विंडो' जैसी व्यवस्था भी निवेशकों को लुभा रही है। अलबत्ता उन्हें कुपोषण जैसे मानव विकास सूचकांक के कुछ मानकों से जरूर जूझना होगा, जिसमें गुजरात अभी काफी पीछे है।
मसलन, खुद मोदी सरकार ने पिछले वर्ष विधानसभा में स्वीकार किया था कि अकेले अहमदाबाद शहर में ही तकरीबन साठ हजार बच्चे कुपोषण का शिकार हैं! वास्तव में आनंदीबेन पटेल को सरकार चलाने के साथ ही भाजपा के उन दिग्गजों को भी साधना होगा, जो खुद को मोदी की जगह देख रहे थे।