देश के दूसरे हिस्से की तरह कोलकाता में भारी भीड़ इकट्ठा कर भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में भी अपनी धमक दिखा दी है, इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन उनका भाषण अगर वहां मौजूद लोगों की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा, तो इसलिए कि उसमें तथ्य कम और राज्य की तृणमूल सरकार के साथ गठजोड़ की क्षीण-सी संभावना को जिलाए रखने का कौशल ज्यादा था।
थोड़े दिनों पहले उसी मैदान पर ममता बनर्जी ने भाजपा से अपनी दूरी जताई थी। वह राज्य के सत्ताइस फीसदी अल्पसंख्यक वोटों की अनदेखी कर भाजपा के साथ जाने का जोखिम शायद ही लेना चाहेंगी। राज्य भाजपा भी तृणमूल की नीतियों के खिलाफ है। अल्पसंख्यकों के हित में लिए गए सरकार के एक फैसले के खिलाफ वह अदालत तक चली गई है।
इसके बावजूद राजनाथ सिंह ने मंच से ममता बनर्जी का समर्थन किया। मैदान में मौजूद लोगों ने जब बताया कि पौने तीन साल पुरानी तृणमूल सरकार के 'पोरिबर्तन' से वे निराश हैं, तब भी नरेंद्र मोदी ने चुप्पी साधे रखी। दीदी के राज में पश्चिम बंगाल बच्चों की मृत्यु, कच्ची शराब से मौत, आमरी अस्पताल हादसा, चिटफंड घोटाला और औरतों के खिलाफ दुर्व्यवहार के कारण कुख्यात है।
पर इनकी अनदेखी कर मोदी राज्य की पिछली वाम मोर्चा और केंद्र की यूपीए सरकारों को निशाना बनाते रहे। उनकी दलील थी कि राज्य के विकास में केवल राज्य सरकार का हाथ नहीं होता। क्या इस तर्क के आधार पर गुजरात के विकास का कुछ श्रेय वह केंद्र को देना चाहेंगे? इससे पहले आखिर इन्हीं मोदी को बिहार में नीतीश कुमार और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह के खिलाफ गरजते हुए सुना ही गया है।
हैरत है कि प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री न बनाने के लिए कांग्रेस की आलोचना करने वाले मोदी को प्रधानमंत्री बनते-बनते रह गए ज्योति बसु की याद नहीं आई। भाजपा को प्रणब मुखर्जी अगर इतने ही प्रिय हैं, तो उनके खिलाफ उसने प्रत्याशी क्यों उतारा था? अव्वल तो पश्चिम बंगाल में भाजपा की चुनौती आसान नहीं है। तिस पर अगर मोदी ऐसे ही अर्धसत्यों और अधूरे तथ्यों के आधार पर बंगाल के कथित स्वाभिमान को जगाकर पार्टी का हित साधना चाहते हैं, तो उन्हें निराशा ही हाथ लगेगी।